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Saturday, 20 January 2018
कोरेगांव में महारों की बहादुरी का सम्मान प्रधानमंत्री मोदी को भी करना चाहिए
फ्रांस में ब्रिटिश सरकार के लिए शहीद भारतीय सैनिकों को सलामी दी जा सकती है तो भीमा कोरेगांव के महार सैनिकों को क्यों नहीं?
अप्रैल 2015, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के लिल ( LILLE) स्थित NEUVE-CHAPELLE युद्ध स्मारक गए थे। वहां जाकर उन्होंने ब्रिटिश सेना की तरफ से फ्रांस की ज़मीन पर मारे गए 10,000 भारतीय सैनिकों की शहादत को सलामी दी थी। ऐसा करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने कहा था कि “हमारे जवानों ने विश्व युद्ध में विदेश ज़मीन पर लड़ाई लड़ी। अपनी निष्ठा, बहादुरी और त्याग के लिए दुनिया की प्रशंसा हासिल की। मैं उन्हें सलाम करता हूं। “
प्रधानमंत्री मोदी भारतीय सैनिकों की जिस निष्ठा और बहादुरी को सलाम कर रहे थे वो ब्रिटिश हुकूमत के प्रति थी न कि हिन्दुस्तान के प्रति। किसी भी लिहाज़ से प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम साहसिक था और अच्छा था। उन्हें याद नहीं रहा होगा वरना सबसे पहले वही कोरेगांव जाकर महार सैनिकों की बहादुरी का सम्मान करते।
कोरेगांव में ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए महार जाति के सैनिकों की बहादुरी का जश्न मनाने पर आपत्ति करने वालों को यह किस्सा ध्यान में नहीं रहा होगा। मैंने कई जगहों पर पढ़ा है कि महार जाति के सैनिक अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए लड़े थे। उनकी वीरता का गौरव गान आज कैसे हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी जब ब्रिटिश सेना में शामिल भारतीय जवानों की वीरता का सम्मान कर सकते हैं तो फिर कोरेगांव की गाथा का भी सम्मान सबको करना चाहिए। मराठा को भी, चितपावनों को भी और प्रधानमंत्री को सबसे पहले। उस जलसे में जिग्नेश के साथ प्रधानमंत्री को भी मंच साझा करना चाहिए था।
इतिहास हमारी दुविधा का इम्तहान ले रहा है। इसका एकमात्र कारण यह है कि जब इतिहास पढ़ने का वक्त होता है, तब हम उसे हिकारत की निगाह से देखते हैं। एक फालतू विषय समझते हैं। जब राजनीति के लिए इतिहास का इस्तमाल होता है, तब हम ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे इतिहास में आचार्य की डिग्री ली हो।
बहुत साल पहले मैंने 1857 की क्रांति पर एक स्पेशल रिपोर्ट तैयार किया था। उस रिपोर्ट में मेरठ के डाक्टर और इतिहासकार और झांसी की मिसेज कैंटम के प्रयासों की चर्चा थी। इन लोगों ने 1857 की क्रांति में मारे गए ब्रिटिश अफसरों और उनकी पत्नियों के कब्रिस्तान को फिर से ठीक ठाक कर दिया था। इन कब्रों को 1857 से जुड़ी स्मृतियों के नक्शे पर ला दिया था। उन कब्रों पर अंग्रेज़ अफ़सर और उनकी पत्नियों के साथ हुई हिंसा की दास्तान लिखी है। आज भी ब्रिटेन से उन अफसरों के ख़ानदान के नाती पोता जत्थे में आते हैं और इन कब्रों का दर्शन करते हैं।
इतिहास का अपराध बोध किसी भी समाज को जकड़ लेता है। वह इतिहास को समझने लायक नहीं रह जाता है। नासमझमी में वह वर्तमान से इतिहास का बदला लेने लगता है। इतिहास विषय की ट्रेनिंग से मैं इस अपराध बोध से उबर सका कि मैंने कोई ग़लती नहीं की है। इतिहास को हमेशा नए नए नज़रिए से देखते रहना चाहिए। सच बात यह है कि जब मैंने यह रिपोर्ट की थी तब लगा कि मुझसे कोई अपराध हो गया है। मुझे खुशी है कि मैंने वो रिपोर्ट की। सिपाहियों पर भी अलग से की।
यह सही है कि 1857 में ब्रिटिश सेना ने कई हज़ार भारतीयों को तोप से उड़ा दिया था। पेड़ से लटका दिया था। दिल्ली में लाल किला और जामा मस्जिद के इलाके में रहने वाले हज़ारों हिन्दुस्तानियों को उड़ा दिया था। यह भी सही है कि जवाबी हमले में ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों और पत्नियों पर भी ज़ुल्म
ढाए गए।
मेरठ के सेंट जॉन सेमिट्री में मैंने देखा कि ईस्ट इंडिया कंपनी के बहादुर अफसर गिलेस्पी की कब्र पर लोग फूल अगरबत्ती चढ़ाते हैं और मन्नतें मांगते हैं। गिलेस्पी की बहादुरी के हिसाब से उसकी क़ब्र काफी भव्य और विशाल है। इन सभी पहलुओं का ज़िक्र करना वतन के साथ गद्दारी नहीं बल्कि इतिहास के साथ एक अच्छा इंसाफ है। इतिहास का मतलब होता है जो हुआ है उसे जानना।
गोदी मीडिया के गुंडा एंकरों और चाटुकार राजनीतिक पत्रकारों ने इस बात का मज़ाक उड़ाया है कि ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए कोई बहादुरी का गौरव गान कैसे कर सकता है। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा के समय दी गई सलामी याद नहीं रही। प्रथम विश्व युद्ध में 11 भारतीयों को विक्टोरिया क्रास मिला था जिनमें से छह फ्रांस और फ्लैंडर्स में लड़ते हुए शहीद हो गए थे। हाल ही में एक फिल्म आई थी डनकर्क। इस फिल्म में भारतीय सैनिकों का पक्ष न दिखाए जाने की बहुत आलोचना हुई थी। इस बात के बावजूद फिल्म बेहद शानदार थी।
इतिहास की किसी घटना को आप मौजूदा पहचान की राजनीति का हिस्सा बनाएंगे तो समस्याएं पैदा होंगी। आनंद तेलतुम्बडे इस बारे में विस्तार से लिखा है कि भीमा कोरेगांव की घटना बहादुरी की मिसाल है मगर इसे अन्य मिसालों का प्रतीक बनाना भी एक तरह से मिथक रचना है। पर यह मिथक नकाबिलके बर्दाश्त अब क्यों हो रहा है. तीन साल से तरह तरह के मिथक बनाए जा रहे हैं। महाराणा प्रताप और रानी पदमिनी के इतिहास के साथ राजस्थान में जो हुआ वह भीमा कोरेगांव की घटना के इतिहासबाज़ी से कैसे अलग है।
अगर एक जाति विशेष को एक फिल्म के बहाने तमाम तरह के मिथकों के ऐतिहासक बना देने का दावा सही है तो एक जाति विशेष को अपने इतिहास के शानदार किस्से से नए नए मिथकों के गढ़ने की छूट क्यों नहीं है? इस अंतहीन सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं है। इतिहास को गौरव गाथा की किताब में आप जिनता समेटेंगे, अपना वर्तमान उतना ही संकुचित करेंगे। इस गौरव का कुछ इलाज कीजिए।
अगर आप वाकई भीमा कोरेगांव की घटना के बारे में जानना चाहते हैं कि 4 जनवरी के इंडियन एक्सप्रेस में गिरिश कुबेर और सुहास पलशिकर का लेख पढ़ सकते हैं। वायर में आनंद तेलतुम्बडे का लेख सबसे अच्छा है। फिर उसके बाद इस बहस में कूदिए।
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