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Saturday, 18 August 2018
प्रेस की आज़ादी पर 300 अमरीकी अख़बारों के संपादकीय
अमरीकी प्रेस के इतिहास में एक शानदार घटना हुई है। 146 पुराने अख़बार बोस्टन ग्लोब के नेतृत्व में 300 से अखबारों ने एक ही दिन अपने अखबार में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर संपादकीय छापे हैं। आप बोस्टल ग्लोब की साइट पर जाकर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर लिखे गए 300 संपादकीय का अध्ययन कर सकते हैं। सबके संपादकीय अलग हैं। पत्रकारिता के विद्यार्थी को सभी संपादकीय पढ़कर उस पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट लिखना चाहिए। आप जानते हैं कि अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प जब तक प्रेस पर हमला करते रहते हैं। प्रेस के ख़िलाफ़ अनाप-शनाप बोलते रहते हैं। अमरीकी प्रेस ने जम कर लोहा लिया है। मैं न्यूयार्क टाइम्स और बोस्टन ग्लोब के संपादकीय का अनुवाद कर रहा हूं ताकि हिन्दी के युवा पत्रकार और पाठक अमरीकी प्रेस के मानस में झांक कर देख सकें।
पहला न्यूयार्क टाइम्स का है-
1787 में जब संविधान का जन्म हुआ था, उस साल थॉमस जफरसन ने अपने मित्र को लिखा था कि अगर मुझ पर इसका फ़ैसला छोड़ा जाता कि सरकार हो मगर अख़बार न हो, अख़बार हो लेकिन सरकार न हो तो मैं एक झटके में दूसरे विकल्प को चुन लेता।
जैफ़रसन की राष्ट्रपति बनने से पहले ये सोच थी। बीस साल बाद व्हाइट हाउस के भीतर से प्रेस को देखने के बाद उनके मन में इसके महत्व को लेकर भरोसा कुछ कम हो गया था। “अख़बार में जो छपता है उस पर कुछ भी विश्वास नहीं किया जा सकता है, इस प्रदूषित वाहन में डालने भर से सत्य संदिग्ध हो जाता है ।” जैफ़रसन के विचार अब ये हो जाते हैं।
जैफ़रसन की असहजता समझी जा सकती है। एक खुले समाज में न्यूज़ की रिपोर्टिंग का उद्यम कई तरह के हितों के टकराव से जुड़ जाता है। उनकी असहजता से उन अधिकारों की ज़रूरत भी झलकती है जिसे उन्होंने संविधान में जोड़ा था। अपने अनुभवों से संविधान निर्माताओं को लगा था कि सही सूचनाओं से लैस जनता को भ्रष्टाचार मिटाने और आगे चलकर आज़ादी और न्याय को प्रोत्साहित करने में मदद मिलती है।
सार्वजनिक बहस राजनीतिक कर्तव्य है। 1964 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था। यह बहस बिना किसी झिझक के खुले मन से होनी चाहिए। कई बार सरकार और सरकारी अधिकारियों पर जमकर हमले होने चाहिए, भले ही वो किसी को अच्छा न लगे।
2018 में सरकारी अधिकारियों की तरफ से ही प्रेस को लेकर क्षति पहुंचाने वाले हमले हुए हैं। किसी स्टोरी को कम दिखाने या ज़्यादा दिखाने को लेकर
न्यूज़ मीडिया की आलोचना ठीक है। कुछ ग़लत छपा हो तो उसकी आलोचना ठीक है। न्यूज़ रिपोर्टर और संपादक भी इंसान हैं। उनसे ग़लतियां होती हैं। उन्हें ठीक करना हमारे पेशे का अहम हिस्सा है। लेकिन आपको जो सत्य पसंद नहीं है उसे फेक न्यूज़ कहना लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है। पत्रकारों को जनता का दुश्मन कहना भी ख़तरनाक है।
अमरीका में छोटे अखबार आर्थिक संकट से गुज़र रहे हैं। देश भर के पत्रकारों की रक्षा के लिए बने कानून भी कमज़ोर हैं। ऐसे में प्रेस पर होने वाले ये हमले उनके लिए चुनौती बन गए हैं। इन सबके बाद भी इन अख़बारों के पत्रकार सवाल पूछने के लिए मेहनत किए जा रहे हैं और आप तक उन स्टोरी को पहुंचा रहे हैं जिनके बारे में आपको पता भी नहीं चलता।
The San Luis Obispo Tribune ने जेल में बंद एक कैदी के बारे में रिपोर्ट छापी थी जिसे 46 घंटे तक रोक कर रखा गया था। इस रिपोर्ट ने देश को मजबूर कर दिया कि जेल में मानसिक रूप से बीमार कैदियों के इलाज में बदलाव लाया जाए।
पिछले हफ्ते The Boston Globe का प्रस्ताव आया था कि उनके इस अभियान में कस्बों के छोटे अख़बारों से लेकर महानगरों के बड़े अख़बार शामिल हो रहे हैं। The Times भी इसमें शामिल हो गया ताकि हम अपने पाठकों को अमरीका के आज़ाद प्रेस के महत्व को याद दिला सकें। ये सभी संपादकीय एकजुट होकर अमरीकी संस्थान के बुनियाद को रेखांकित कर रहे हैं।
अगर आपने इन संपादकीय को नहीं पढ़ा है तो प्लीज़ लोकल अखबारों को सब्सक्राइब करें, जब भी वे अच्छा काम करें, उनकी तारीफ करें और अगर लगे कि इससे भी अच्छा कर सकते हैं तो उनकी आलोचना करें। हम सब इसमें साथ हैं।
न्यू यॉर्क टाइम्स का संपादकीय यहां समाप्त होता है।
क्या भारत के बड़े अख़बार छोटे अख़बारों के हक में ऐसे संपादकीय लिख सकते हैं, क्या वे प्रेस की आज़ादी के अपने अभियान में छोटे अख़बारों को शामिल करते हैं? न्यू यार्क टाइम्स के इस संपादकीय से आपको झलक मिलती है कि हम लोकतांत्रिक मूल्यों को अभिव्यक्त करने में कितना पीछे हैं। इसलिए हिन्दी के पत्रकार जिनका जीवन हिन्दी के अखबारों में निश्चित ही नष्ट होने वाला है, उन्हें इसे पढ़ना चाहिए। कई बार स्वाध्याय ही नष्ट होने से बचा लेता है। अख़बार और पत्रकारिता नष्ट हो जाएगा मगर एक पढ़ा लिखा सचेत पत्रकार बचा रहेगा। वो बच जाएगा तो फिर कभी सब ठीक भी हो जाएगा।
अब आप अमरीका के दि बास्टल ग्लोब अखबार की साइट पर जाएं। वहां इस अभियान के बारे में लिखा है। इस अख़बार ने उन सभी अखबारों के संपादकीय बोर्ड से संपर्क साधा जो उदार मूल्यों और प्रेस की आज़ादी में यकीन रखते हैं।
“राष्ट्रपति ट्रंप की राजनीति के मुख्य केंद्र में आज़ाद प्रेस पर लगातार हमला करते रहना। पत्रकारों को अमरीकी नागरिक नहीं माना जाता है बल्कि उन्हें लोगों के दुश्मन की तरह पेश किया जा रहा है। आज़ाद प्रेस पर होने वाले निरंतर हमलों के ख़तरनाक परिणाम होंगे।इसलिए हमने देश भर के सभी छोटे और बड़े उदारवादी और रूढ़ीवादी अख़बारों के संपादकीय बोर्ड से संपर्क किया कि वे इन बुनियादी हमलों को लेकर अपने शब्दों में संपादकीय लिखें। ”
जब देश में कोई भी भ्रष्ट सत्ता काबिज़ होती है तब उसका काम होता है कि आज़ाद प्रेस की जगह सरकार संचालित मीडिया को ले आए। आज अमरीका में हमारे पास एक ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने ऐसी सोच तैयार कर दी है कि मीडिया का जो हिस्सा मौजूदा प्रशासन की नीतियों को सपोर्ट नहीं करता है, वह जनता का दुश्मन है। राष्ट्रपति द्वारा फैलाए गए कई झूठ में से एक झूठ यह भी है।
” स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता अनिवार्य है।” जॉन एडम का यह सूत्र वाक्य 200 सालों से ज़्यादा अमरीकी सिद्धांतों का हिस्सा रहा है जिसने पत्रकारों की देश में रक्षा की है। दुनिया के अन्य देशों में प्रेस के लिए मॉडल का काम करता रहा है। आज इस पर गंभीर ख़तरा है। बीजिंग से बगदाद और अंकारा से लेकर मॉस्को तक के तानाशाहों की तरफ से ये सिग्नल लगातार दिया जा रहा है कि पत्रकारों को जनता का दुश्मन घोषित किया जा सकता है।
स्वतंत्रत समाज के लिए प्रेस अनिवार्य है क्योंकि यह नेताओं पर आंख बंद कर भरोसा नहीं करता है। चाहे वो स्थानीय योजना बोर्ड के सदस्य हों या फिर व्हाईट हाउस के। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि मौजूदा राष्ट्रपति के वित्तीय मामलों में कई झोल हैं, जिनके संदिग्ध व्यावहारों के चलते उन्हीं के जस्टिस डिपार्टमेंट ने उनकी जांच के लिए एक स्वतंत्र वकील की नियुक्ति की है। अब ऐसे राष्ट्रपति ने उन पत्रकारों को धमकाने की बहुत कोशिश की है जो स्वंत्तर रूप से कई तथ्यों को सामने लाते हैं।
अमरीका में सबके बीच एक स्थापित और निष्पक्ष सहमति रही है कि प्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसके बाद भी अब ऐसे बहुत से अमरीकन हैं जो इस मत को नहीं मानते हैं। इस महीने Ipsos ने एक सर्वे किया था जिसमें 48 फीसदी रिपब्लिक समर्थकों ने माना है कि न्यूज़ मीडिया अमरीकी जनता का दुश्मन है। एक और सर्वे में 51 फीसदी रिपब्लिकन ने प्रेस की तुलना जनता के दुश्मन से की है। लोकतंत्र का अहम हिस्सा नहीं माना है।
ट्रंप के हमले से पता चलता है कि क्यों उनके समर्थक इस अलोकतांत्रिक रवैये का समर्थन करते हैं। एक चौथाई अमरीकी अब कहने लगे हैं कि राष्ट्रपति के पास ख़राब बर्ताव करने वाले प्रेस को बंद करने का अधिकार होना चाहिए। इस सर्वे में शामिल 13 फीसदी लोगों ने कहा है कि राष्ट्रपति को CNN, The Washington Post and The New York Times जैसे समाचार माध्यमों को बंद कर देना चाहिए।
अपने समर्थकों को उकसाने वाला यह मॉडल बता रहा है कि 21 वीं सदी के तानाशाह रूस के पुतीन और तुर्की के एर्दोगन कैसे काम करते हैं। आपको सूचनाओं को रोकने के लिए आधिकारिक रूप से सेंशरशिप के एलान की ज़रूरत ही नहीं है।
ट्रंप के समर्थक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उनका इशारा सिर्फ उस मीडिया की तरफ है जो तटस्थ नहीं हैं। वे सारे प्रेस के बारे में ऐसा नहीं कहते हैं। लेकिन राष्ट्रपति के अपने ही शब्द और उनका रिकार्ड बार बार यही बताता है कि समर्थकों के इस तर्क में कितनी बेईमानी है।
अमरीकी के संस्थापकों ने इस बात को महसूस किया था कि प्रेस तटस्थ नहीं भी हो सकता है फिर भी उन्होंने संविधान में प्रेस और पत्रकारों की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया था। थॉमस जेफ़रसन ने लिखा था कि हमारी स्वतंत्रता प्रेस की स्वतंत्रता पर निर्भर करती है और उसकी कोई सीमा नहीं तय की जा सकती है।
संविधान के संस्थापकों से लेकर सभी दलों के नेताओं को मीडिया से शिकायतें रही हैं। मीडिया पर आरोप लगाते रहे हैं लेकिन एक संस्थान के रूप में प्रेस का हमेशा सम्मान किया गया है। बहुत लंबे समय की बात नहीं है जब रिपब्लिकन राष्ट्रपति रोनल्ड रेगन ने कहा था कि मुक्त प्रेस की हमारी परंपरा हमारे लोकतंत्र का अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग रहा है और रहेगा।
1971 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ह्यूगो ब्लैक ने लिखा था कि प्रेस का काम शासित की सेवा करना है न कि शासक का। आज ट्रंप अपने साथ उसी मीडिया को लेकर ले जाते हैं जो उनके नेतृत्व की वकालत करता है। सवाल नहीं करता है।
देखा जाए तो सिर्फ राष्ट्रपति ही अपने राजनीतिक और निजी फायदे के लिए लोगों में विभाजन नहीं कर रहे हैं। वे अपने समर्थकों से भी कहते हैं कि वो जो कह रहे हैं उसी का अनुकरण करें। पिछले महीने कंसास में उन्होंने कहा था कि बस हमारी सुनो, ये लोग( प्रेस) जो बकवास दिखाते हैं उस पर यकीन मत करो। इतना याद रखना कि जो आप देख रहे हैं या पढ़ रहे हैं वही सिर्फ नहीं हो रहा है। जार्ज ओरवेल ने अपने उपन्यास 1984 में कहा था कि “जो पार्टी आपको यह कहे कि अपनी आंखों और कानों के देखे-सुने सबूतों को मत मानो, यह उनकी तरफ से सबसे अनिवार्य और अंतिम फरमान है। ”
George Orwell put it more gracefully in his novel “1984.” “The party told you to reject the evidence of your eyes and ears. It was their final, most essential command.”
आज ट्रंप अपने समर्थकों को यही करने के लिए कहते हैं। अपने कार्यकाल के पहले 558 दिनों में उन्होंने 4,229 ग़लत दावे किए हैं। वाशिंगटन पोस्ट ने उनके झूठे दावों की सूची बनाई है। फिर भी ट्रंप के समर्थकों में मात्र 17 फीसदी ऐसे हैं जो मानते हैं कि अमरीकी प्रशासन लगातार झूठ बोलता रहता है। उनका झूठ ही तथ्य बनता जा रहा है।
सूचनाओं से लैस नागरिकों के लिए झूठ उनके वजूद को नकारता है। अमरीका की महानता इस पर निर्भर है कि मुक्त प्रेस सत्ता के सामने खुलकर सत्य का बयान करे। प्रेस पर जनता का दुश्मन का लेबल चिपकाना अमरीकी पंरपरा नहीं है। दो सौ सालों जो जिस नागरिकता की साझा समझ हमने विकसित की है, उसके लिए यह फरमान ख़तरा है।
दि बोस्टन ग्लोब का संपादकीय यहां समाप्त होता है।
नोट- अच्छा होता कि कोई सभी तीन सौ संपादकीय का अनुवाद पेश करता है क्योंकि हर संपादकीय में अलग अनुभव और तथ्य हैं। इससे प्रेस की आज़ादी को लेकर हमारी समझ और विस्तृत होती है। हिन्दी के पाठकों और पत्रकारों के लिए मैंने अपनी छुट्टी के तीन चार घंटे लगाकर यहां अनुवाद किए हैं।यह इसलिए भी लिखा है ताकि आपको पता रहे कि इस तरह के काम में मेहनत लगती है। वक्त लगता है। सब कुछ फोकट में नहीं आता है। अगर आप चाहते हैं कि समाज बेहतर हो, तो अपने हिस्से का श्रमदान कीजिए। आने वाले दिनों में कुछ और संपादकीय का अनुवाद करूंगा।
Monday, 13 August 2018
एक कैंपस के भीतर 29 बच्चियों के साथ बलात्कार होता रहा, बिहार सोता रहा
बिहार के मुज़फ्फरपुर में एक बालिका गृह है। इसे चलाते हैं एन जी ओ और सरकार पैसे देती है। इस बालिका गृह में भागी भटकी हुई लड़कियों को ला कर रखा जाता है, जिनका कोई ठिकाना नहीं होता है, मां बाप नहीं होते हैं। इस बालिका गृह में रहने वाली लड़कियों की उम्र 7 से 15 साल के बीच बताई जाती है। टाटा इस्टिट्यूट ऑफ साइंस जैसी संस्था ने इस बालिका गृह का सोशल ऑडिट किया था जिसमें कुछ लड़कियों ने यौन शोषण की शिकायत की थी। उसके बाद से 28 मई को एफ आई आर दर्ज हुआ और कशिश न्यूज़ चैनल ने इस ख़बर को विस्तार से कवर किया। यहां रहने वाली 42 बच्चियों में से 29 के साथ बलात्कार और लगातार यौन शोषण के मामले की पुष्टि हो चुकी है। एक कैंपस में 29 बच्चियों के साथ बलात्कार का नेटवर्क एक्सपोज़ हुआ हो और अभी तक मुख्य आरोपी का चेहरा किसी ने नहीं देखा है। पुलिस की कार्रवाई चल रही है मगर उसी तरह चल रही है जैसे चलती है। मई से जुलाई आ गया और पुलिस मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर को रिमांड पर नहीं ले सकी।
इस मामले को शिद्दत से कवर करने वाले संतोष सिंह को राजधानी पटना की मीडिया की चुप्पी बेचैन कर रही है। वे हर तरह से समझना चाहते हैं कि एक कैंपस में 29 बच्चियों के साथ बलात्कार का एक पूरा नेटवर्क सामने आया है जिसमें राजनीतिक, न्यायपालिका, नौकरशाही और पत्रकारिता सब धुल मिट्टी की तरह लोट रहे हैं फिर भी मीडिया अपनी ताकत नहीं लगा रहा है। रिपोर्टर काम नहीं कर रहे हैं। संतोष को लगता है कि पूरा तंत्र बलात्कारी के साथ खड़ा है। इस मामले को लेकर विधानसभा और लोकसभा में हंगामा हुआ है मगर रस्मे अदाएगी के बाद सबकुछ वहीं है। ख़बर की पड़ताल ठप्प है तब भी जब 11 में से 10 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
“जिस बालिका गृह में 42 में से 29 लड़कियों के साथ रेप हुआ हो, यह कैसे संभव है कि वहां हर महीने जांच के लिए जाने वाले एडिशनल ज़िला जज के दौरे के बाद भी मामला सामने नहीं आ सका। बालिका गृह के रजिस्टर में दर्ज है कि न्याययिक अधिकारी भी आते थे और समाज कल्याण विभाग के अधिकारी के लिए भी सप्ताह में एक दिन आना अनिनार्य हैं ।”
यह हिस्सा संतोष सिंह के पोस्ट का है। संतोष ने लिखा है कि बालिका गृह की देखरेख के लिए पूरी व्यवस्था बनी हुई है। समाज कल्याण विभाग के पांच अधिकारी होते हैं, वकील होते हैं, समाजिक कार्य से जुड़े लोग होते हैं। एक दर्जन से ज्यादा लोगों की निगरानी के बाद भी 29 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है।आप जानते हैं कि हाईकोर्ट के अधीन राज्य विधिक आयोग होता है जिसके मुखिया हाईकोर्ट के ही रिटायर जज होते हैं । बालिका गृहों की देखरेख की जिम्मेवारी इनकी भी होती है। मामला सामने आते ही उसी दिन राज्य विधिक आयोग कि टीम बालिका गृह पहुंची। उसकी रिपोर्ट के बारे में जानकारी नहीं है।
संतोष सिंह ने लिखा है कि बालिका गृह को चलाने वाला ब्रजेश ठाकुर पत्रकार भी रहा है और पत्रकारों के नेटवर्क में उसकी पैठ है। संतोष समझना चाहते हैं कि क्या इस वजह से मीडिया में चुप्पी है। बिहार के अख़बारों और चैनलों ने इस ख़बर को प्रमुखता नहीं दी। ज़िला संस्करण में ख़बर छपती रही मगर राजधानी पटना तक नहीं पहुंची और दिल्ली को तो पता ही नहीं चला। ब्रजेश ठाकुर के कई रिश्तेदार किसी न किसी चैनल से जुड़े हैं।
ब्रजेश ठाकुर गिरफ्तार भी हुआ मगर तीसरे दिन बीमारी के नाम पर अस्पताल पहुंच गया। अस्पताल से ही फोन करने लगा तो बात ज़ाहिर हो गई। पुलिस को वापस जेल भेजना पड़ा। ब्रजेश ठाकुर के परिवार वालों का कहना है कि रिपोर्ट में उनका नाम इसलिए आया कि उन्होंने पैसा नहीं दिया। न ही समाज कल्याण विभाग के एफ आई आर में उनका नाम है। किसी का भी नाम नहीं है। फिर उन्हें निशाना क्यों बनाया जा रहा है।इस बात की तो पुष्टि हो ही चुकी है कि 29 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है। यह रिपोर्ट तो झूठी नहीं है।
ब्रजेश ठाकुर दोषी है या नहीं, यह एक अलग सवाल है मगर जांच नहीं होगी तो पता कैसे चलेगा। जांच कैसे हो रही है, इस पर नज़र नहीं रखी जाएगी तो जांच कैसी होगी, आप समझ सकते हैं। सबके हित में है कि जांच सही से हो।
संतोष सिंह ने ब्रजेश ठाकुर के रिमांड न मिलने पर भी हैरानी जताई है।
” ऐसा पहला केस देखने को मिला है जिसमें पुलिस ब्रजेश ठाकुर से पुछताछ के लिए रिमांड का आवेदन देती है लेकिन कोर्ट ने रिमांड की अनुमति नहीं दी। पुलिस ने दोबारा रिमांड का आवेदन किया तो कोर्ट ने कहा कि जेल में ही पूछताछ कीजिए । बाद में पुलिस ने कहां कि जेल में ब्रजेश ठाकुर पुछताछ में सहयोग नहीं कर रहे हैं,, दो माह होने को है अभी तक पुलिस को रिमांड पर नहीं मिला है ।” संतोष की इस बात पर ग़ौर कीजिए।
बिहार सरकार भी इस मामले में चुप रही। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस ने 23 अप्रैल को बिहार समाज कल्याण विभाग को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। फिर भी कोई एक्शन नहीं हुआ। कशिश न्यूज़ ने इसका खुलासा नहीं किया होता तो किसी को भनक तक नहीं लगती और क्या पता बच्चियों के साथ
बलात्कार होते रहता। एक महीने बाद समाज कल्याण विभाग एफ आई आर दर्ज करता है।
संतोष ने यह भी लिखा है कि मुज़फ्फरपुर की एस एस पी हरप्रीत कौर ने अगर सक्रियता न दिखाई होती तो इस मामले में थोड़ी बहुत कार्रवाई भी नहीं होती।
आप इसे चाहे जैसे देखें, मगर सिस्टम में इतना घुन लग गया है कि पेशेवर तरीके से कुछ भी होने की कोई उम्मीद नहीं है। वर्षों मुकदमा चलेगा, किसी को कुछ नहीं होगा। आखिर बिहार का मीडिया और मुज़फ्फपुर का नागरिक समाज इस सवाल पर चुप क्यों है कि एक कैंपस में 29 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है। उसे यह जानने में दिलचस्पी या बेचैनी क्यों नहीं है कि किन किन लोगों के सामने इन्हें डरा धमका कर पेश किया गया। क्या ये बलात्कार के लिए बाहर ले जाई गईं या बलात्कारी बालिका गृह के भीतर आए?
सरकारें चुरा रही हैं नौकरियां, नौजवान खा रहे हैं झांसा
क्या केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने वो कह दिया जो सब जानते हैं। उनका बयान आया कि आरक्षण लेकर क्या करोगे, सरकार के पास नौकरी तो है नहीं। बाद में नितिन गडकरी की सफाई आ गई कि सरकार आरक्षण का आधार जाति की जगह आर्थिक नहीं करने जा रही है। मगर इसी बयान का दूसरा हिस्सा भी था कि सरकार के पास नौकरी है नहीं। क्या वाकई सरकार या सरकारों के पास नौकरी नहीं है या वो देना नहीं चाहती हैं? आइये ज़रा इस पर विचार करते हैं।
इस बयान को 5 अगस्त के टाइम्स आफ इंडिया में छपी पहली ख़बर के साथ मिलाकर देखिए। अख़बार ने फरवरी से जुलाई के बीच संसद में अलग अलग विभागों के संदर्भ में दिए गए आंकड़ों को एक जगह जमा कर पेश किया है। इससे यह तस्वीर बनती है कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास 24 लाख नौकरियां हैं। जिन पर वे बैठी हुई हैं।
भारत के नौजवानों का दिल आज धड़क ही गया होगा जब उनकी नज़र इस ख़बर पर पड़ी होगी। प्राइम टाइम की नौकरी सीरीज़ में हम यह बात पिछले कई महीने से दिखा रहे हैं। अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ही पचासों लेख लिख चुका हूं। 24 लाख नौकिरयां होते हुए भी नहीं दी गईं हैं, नहीं दी जा रही हैं या देने में देरी की जा रही हैं, यह सूचना भारत के नौजवानों के उस तबके में है जो इन नौकरियों की तैयारी करते हैं। जो हर दिन भर्तियां निकलने का इंतज़ार करते हैं। जिन्हें पता है कि किस राज्य के लोक सेवा आयोग की भर्ती नहीं निकली है।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने जो संकलन किया है उसके अनुसार 10 लाख नौकरियां तो सिर्फ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में हैं। लाखों नौजवान बीटेट और बीएड करके घर बैठे हैं मगर कहीं बहाली नहीं है। जहां कहीं है भी वहां ठेके पर है। पूरा काम करते हैं, पूरी सैलरी नहीं मिलती है। हक की बात करो तो सबको निकम्मा बताया जाने लगता है। क्या वाकई राजनीति को व्हाट्स एप पर भेजे जाने वाले प्रोपेगैंडा पर भरोसा हो चला है कि छात्र इन्हीं में उलझा रहेगा, कभी अपनी नौकरी की न बात करेगा न पूछेगा?
अख़बार ने लिखा है कि पुलिस में पांच लाख 40 हज़ार वेकेंसी है। अर्ध सैनिक बलों में 61,509, सेना में 62,084, पोस्टल विभाग में 54,263, स्वास्थ्य केंद्रों पर 1.5 लाख, आंगनवाड़ी वर्कर में 2.2 लाख वेकेंसी है। एम्स में 21, 470 वेकेंसी है। अदालतों में 5,853 वेकेंसी है। अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में 12, 020 वेकेंसी है।
इन सबके अलावा रेलवे में 2.4 लाख नौकरियां हैं। चार साल से नौजवान तैयारी करते रह गए, रेलवे में बहाली नाम मात्र की आई। किसी किसी विभाग में तो आई ही नहीं। रेलवे में 2 लाख से अधिक वेकैंसी है। फिर भी डेढ़ लाख भी नहीं निकली है। इस बार ज़रूर फार्म भरे जाने के बाद रेलवे ने सहायक लोको पायलट की संख्या 26,500 से बढ़ाकर 60,000 करने का फैसला किया है। अच्छी बात है मगर सहायक स्टेशन मास्टर की बहाली जैसा न हो जाए। 2016 में 18000 पदों के लिए फार्म भराया मगर नतीजा आया तो 4000 सीट कम हो गई। ऐसी कितनी ही परीक्षाओं के उदाहरण मिल जाएंगे। रेलवे में भी और रेलवे के बाहर भी।
रेलवे की परीक्षा के सेंटर दूर दूर दिए गए हैं। सरकार ने इस मामले में कोई राहत नहीं दी है जबकि बड़ी संख्या में ग़रीब छात्र नहीं पहुंच पाएंगे या जाने के लिए कर्ज़ ले रहे हैं। वे अभी भी लिख रहे हैं कि एक दो बार और प्राइम टाइम में दिखा दें, हम लोग वाकई तनाव में हैं। रेल समय से नहीं चलती है। कई दिन पहले निकलना पड़ेगा। इस बीच दूसरी परीक्षाएं छूट जाएंगी। क्या पास के सेंटर पर परीक्षा नहीं हो सकती है? लेकिन रेलवे ने इसकी जगह वेकेंसी बढ़ा दी। बहुत अच्छा किया मगर इससे छात्रों की इस समस्या का समाधान नहीं हुआ कि पैसे के कारण वे सेंटर तक नहीं जा पा रहे हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया का यह डेटा पूरा नहीं है। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारी चयन आयोगों के आंकड़े नहीं हैं। इसमें यह भी नहीं है कि कितनी भर्तियां अटकी पड़ी हैं। कितनी भर्तियां तीन तीन साल से अटकी पड़ी हैं। फार्म भरा गया है, परीक्षा नहीं, परीक्षा हो गई है, रिज़ल्ट नहीं, रिज़ल्ट निकल गया है, ज्वाइनिंग नहीं। भारत के सरकार के स्टाफ सलेक्शन कमीशन की भर्तियां कम हो गई हैं। नौजवानों से फार्म भरने के 3000 तक पैसे लिए जा रहे हैं। पैसे लेकर परीक्षा रद्द होती है, वो लौटाए नहीं जाते हैं। नौजवानों को पीस कर रख दिया है इन आयोगों ने। आयोग छोड़िए, कोर्ट की भर्तियां समय से और बिना विवाद के नहीं हो पा रही हैं।
बिहार सिविल कोर्ट क्लर्क परीक्षा 2016 का रिज़ल्ट अभी तक नहीं निकला है। हाल ही में नौजवानों ने रिज़ल्ट निकालने को लेकर पटना के गांधी मैदान में प्रदर्शन भी किया था।
अगर 24 लाख में राज्यों के आयोगों से आंकड़े लेकर जोड़ दिए जाएं तो यह संख्या पचास लाख तक पहुंच सकती है। 28 जुलाई के दि हिन्दू में विकास पाठक की रिपोर्ट है कि पिछले तीन साल में कालेजों में टेम्पररी से लेकर प्रोफेसर की कुल संख्या में 2.34 लाख की गिरावट आ गई है। 2015-16 में 10.09 लाख शिक्षक थे, 2017-18 में यह संख्या घटकर 8.88 लाख पर आ गई है। रिपोर्टर ने इस का सोर्स ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन रिपोर्टर 2017-18 का बताया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह संख्या नहीं है।
हमने कई महीने नौकरी सीरीज़ चलाई है। अभी भी चलती रहती है। अभी भी छात्र अपनी नौकरियों को लेकर लिखते रहते हैं। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग इंजीनियरिंग सेवाओं की परीक्षा आयोजित करती है। 2013 की परीक्षा का फार्म दिसंबर 2013 में निकला था। तीन साल बाद यानी अप्रैल 2016 में परीक्षा होती है। अब छात्र जब रिजल्ट के लिए आयोग से संपर्क करते हैं तो कोई जवाब नहीं मिलता है। 2017 से लेकर वे आज तक विरोध प्रदर्शन ही कर रहे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। राजस्थान, बिहार, बंगाल, पंजाब, मध्य प्रदेश से तो आए दिन छात्र लिखते रहते हैं।
ज़ाहिर है इन सभी नौकरियों की संख्या को जोड़ लें और कुछ साल पहले की संख्या से मिलाकर देखें तो समझ आएगा कि कितनी नौकरियां कम कर दी गई हैं। कम करने के बाद भी जो सीटें हैं, उन्हें भरा नहीं जा रहा है।
क्या ये नौजवान वोट नहीं देते हैं, क्या इन्होंने किसी को वोट नहीं दिया था? सरकारों को कितना वक्त लगेगा कि हर विभाग में ख़ाली पदों के बारे में बताने में? पर यह सवाल पूछ कौन रहा है?क्या नौजवानों को इस सवाल का जवाब चाहिए? यह सवाल पहले वे ख़ुद से पूछें।
नोट- ऐसे लेख अंग्रेज़ी अखबारों में कहीं कोने में तो कभी इधर उधर से छप जाते हैं। हिन्दी अखबारों से ऐसे विश्लेषण गायब होते जा रहे हैं। ज़रा ध्यान से पढ़िए। आपकी ही जवानी का सवाल है। नौकरी का तो है ही। u
Thursday, 1 February 2018
नौकरियां कहां हैं, नौजवान कहां हैं, उनकी कहानियां कहां हैं
ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि सरकार पांच साल से ख़ाली पड़े पद समाप्त करने जा रही हैं। यह साफ नहीं है कि लगातार पांच साल से ख़ाली पड़े पदों की संख्या कितनी है। अवव्ल तो इन पर भर्ती होनी चाहिए थी मगर जब नौजवान हिन्दू मुस्लिम डिबेट में हिस्सा ले ही रहे हैं तो फिर चिन्ता की क्या बात। यह आत्मविश्वास ही है कि जिस समय रोज़गार बहस का मुद्दा बना हुआ है
उस समय यह ख़बर आई है।
वित्त मंत्रालय ने 16 जनवरी को अलग अलग मंत्रालयों और विभागों को ऐसे निर्देश भेज दिए हैं। विभाग प्रमुखों से कहा गया है कि ऐसे पदों की पहचान करें और जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपे।
इस ख़बर में नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का दिल धड़का दिया है। अब ये नौजवान क्या करेंगे, कोई इनकी क्यों नहीं सुनता, इन नौजवानों ने आख़िर क्या ग़लती कर दी ? बहुत सी परीक्षाएं हो चुकी हैं मगर ज्वाइनिंग नहीं हो रही है। 30 जनवरी को यूपी में तीन तीन भर्तियां रद्द हो गईं। लड़के उदास मायूस हैं। रो रहे हैं। उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
जिस 16 जनवरी को वित्त मंत्रालय ने तमाम विभागों को निर्देश दिए कि पांच साल से ख़ाली पड़े पदों को समाप्त कर दिया जाए, उसी 16 जनवरी को एक और ख़बर छपी थी। यह ख़बर भी वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर थी कि 1 मार्च 2016 तक चार लाख से अधिक पद ख़ाली पड़े थे। ये सारे पद केंद्र सरकार के विभागों से संबंधित हैं।
16 जनवरी के इकोनोमिक टाइम्स में रिपोर्ट छपी है कि 1 मार्च 2016 तक ग्रुप ए के 15, 284 पद ख़ाली थे। ग्रुब बी के 49, 740 पद ख़ाली पड़े थे। ग्रुप सी के 3, 21, 418 पद ख़ाली थे। ग्रुप सी के इन पदों के लिए लाखों की संख्या में मेरे नौजवान दोस्त आस लगाए बैठत हैं। आज इतने बड़े देश में इन नौजवानों के लिए बात करने वाला एक नेता नहीं है। मुझे क्रांति का गाना याद आ रहा है। वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो।
पिछले साल नवंबर में खादी ग्रामोद्योग आयोग ने 300 से अधिक की भर्ती निकाली। फार्म के लिए 1200 रुपये लिए और फीस लेने के कुछ दिन के भीतर ही भर्ती की प्रक्रिया अस्थायी रूप से स्थगित कर दी। ढाई महीने हो गए, उसका कुछ अता पता नहीं है। सोचिए खादी ग्रामोद्योग फार्म भरने के 1200 रुपये ले रहा है। सोचिए कि ये लोगों को सवाल नहीं लगता है।
2016-17 में प्रधानमंत्री रोज़गार प्रोत्साह योजना लांच हुई थी। एक साल में ही इसका बजट आधा किए जाने के संकेत है। ऐसा बिजनेस स्टैंडर्ड के रिपोर्टर सोमेश झा ने लिखा है। इस योजना के तहत अगर कोई कंपनी अपने कर्मचारी को EPFO, EPS में पंजीकृत कराती है तो सरकार तीन साल तक कंपनी का 8.33 प्रतिशत हिस्सा ख़ुद भरेगी। इससे लाभान्वित कर्मचारी वही होंगे जिनकी सैलरी 15000 रुपये प्रति माह तक ही होगी। सरकार ने इस योजना के लिए 1000 करोड़ का प्रावधान किया था।
अखबार लिखता है कि दिसंबर 2017 तक EPFO को मात्र 2 अरब रुपये ही मिले थे। उसने श्रम मंत्रालय को पत्र लिखकर 500 करोड़ की मांग की है। इसका मतलब यह है कि कंपनियों ने पंजीकृत तो करा दिया है मगर कंपनियों को हिस्सा नहीं मिल रहा है। 2017-18 के लिए 700 करोड़ की ही ज़रूरत पड़ी है।
इसका एक और मतलब है कि EPFO के रिकार्ड पर कम ही कर्मचारी जुड़े हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि जुलाई 2017 तक 9000 कंपनियों के 3, 61,024 लाख कर्मचारियों ने EPFO का लाभ लिया। उसके बाद अगस्त से दिसंबर 2017 के बीच 28,661 कंपनियों के 18 लाख कर्मचारियों ने इस योजना का लाभ लिया।
इस तरह कुल संख्या करीब 22 लाख के करीब बैठती है। हर महीने 3 लाख 66 हज़ार नए कर्मचारी EPFO से जुड़ते हैं। आप कह सकते हैं कि ये रोज़गार का आंकड़ा दर्शाता है। मगर कई बार कंपनियां सरकार की योजना का लाभ लेने के लिए उन कर्मचारियों को इस योजना से जोड़ती हैं जो पहले से काम कर रहे हैं। इसलिए दावे से नहीं कह सकते हैं कि यह नया रोज़गार है।
नौकरियां कहां हैं, नौजवान कहां हैं, उनकी कहानियां कहां हैं
ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि सरकार पांच साल से ख़ाली पड़े पद समाप्त करने जा रही हैं। यह साफ नहीं है कि लगातार पांच साल से ख़ाली पड़े पदों की संख्या कितनी है। अवव्ल तो इन पर भर्ती होनी चाहिए थी मगर जब नौजवान हिन्दू मुस्लिम डिबेट में हिस्सा ले ही रहे हैं तो फिर चिन्ता की क्या बात। यह आत्मविश्वास ही है कि जिस समय रोज़गार बहस का मुद्दा बना हुआ है
उस समय यह ख़बर आई है।
वित्त मंत्रालय ने 16 जनवरी को अलग अलग मंत्रालयों और विभागों को ऐसे निर्देश भेज दिए हैं। विभाग प्रमुखों से कहा गया है कि ऐसे पदों की पहचान करें और जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपे।
इस ख़बर में नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का दिल धड़का दिया है। अब ये नौजवान क्या करेंगे, कोई इनकी क्यों नहीं सुनता, इन नौजवानों ने आख़िर क्या ग़लती कर दी ? बहुत सी परीक्षाएं हो चुकी हैं मगर ज्वाइनिंग नहीं हो रही है। 30 जनवरी को यूपी में तीन तीन भर्तियां रद्द हो गईं। लड़के उदास मायूस हैं। रो रहे हैं। उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
जिस 16 जनवरी को वित्त मंत्रालय ने तमाम विभागों को निर्देश दिए कि पांच साल से ख़ाली पड़े पदों को समाप्त कर दिया जाए, उसी 16 जनवरी को एक और ख़बर छपी थी। यह ख़बर भी वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर थी कि 1 मार्च 2016 तक चार लाख से अधिक पद ख़ाली पड़े थे। ये सारे पद केंद्र सरकार के विभागों से संबंधित हैं।
16 जनवरी के इकोनोमिक टाइम्स में रिपोर्ट छपी है कि 1 मार्च 2016 तक ग्रुप ए के 15, 284 पद ख़ाली थे। ग्रुब बी के 49, 740 पद ख़ाली पड़े थे। ग्रुप सी के 3, 21, 418 पद ख़ाली थे। ग्रुप सी के इन पदों के लिए लाखों की संख्या में मेरे नौजवान दोस्त आस लगाए बैठत हैं। आज इतने बड़े देश में इन नौजवानों के लिए बात करने वाला एक नेता नहीं है। मुझे क्रांति का गाना याद आ रहा है। वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो।
पिछले साल नवंबर में खादी ग्रामोद्योग आयोग ने 300 से अधिक की भर्ती निकाली। फार्म के लिए 1200 रुपये लिए और फीस लेने के कुछ दिन के भीतर ही भर्ती की प्रक्रिया अस्थायी रूप से स्थगित कर दी। ढाई महीने हो गए, उसका कुछ अता पता नहीं है। सोचिए खादी ग्रामोद्योग फार्म भरने के 1200 रुपये ले रहा है। सोचिए कि ये लोगों को सवाल नहीं लगता है।
2016-17 में प्रधानमंत्री रोज़गार प्रोत्साह योजना लांच हुई थी। एक साल में ही इसका बजट आधा किए जाने के संकेत है। ऐसा बिजनेस स्टैंडर्ड के रिपोर्टर सोमेश झा ने लिखा है। इस योजना के तहत अगर कोई कंपनी अपने कर्मचारी को EPFO, EPS में पंजीकृत कराती है तो सरकार तीन साल तक कंपनी का 8.33 प्रतिशत हिस्सा ख़ुद भरेगी। इससे लाभान्वित कर्मचारी वही होंगे जिनकी सैलरी 15000 रुपये प्रति माह तक ही होगी। सरकार ने इस योजना के लिए 1000 करोड़ का प्रावधान किया था।
अखबार लिखता है कि दिसंबर 2017 तक EPFO को मात्र 2 अरब रुपये ही मिले थे। उसने श्रम मंत्रालय को पत्र लिखकर 500 करोड़ की मांग की है। इसका मतलब यह है कि कंपनियों ने पंजीकृत तो करा दिया है मगर कंपनियों को हिस्सा नहीं मिल रहा है। 2017-18 के लिए 700 करोड़ की ही ज़रूरत पड़ी है।
इसका एक और मतलब है कि EPFO के रिकार्ड पर कम ही कर्मचारी जुड़े हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि जुलाई 2017 तक 9000 कंपनियों के 3, 61,024 लाख कर्मचारियों ने EPFO का लाभ लिया। उसके बाद अगस्त से दिसंबर 2017 के बीच 28,661 कंपनियों के 18 लाख कर्मचारियों ने इस योजना का लाभ लिया।
इस तरह कुल संख्या करीब 22 लाख के करीब बैठती है। हर महीने 3 लाख 66 हज़ार नए कर्मचारी EPFO से जुड़ते हैं। आप कह सकते हैं कि ये रोज़गार का आंकड़ा दर्शाता है। मगर कई बार कंपनियां सरकार की योजना का लाभ लेने के लिए उन कर्मचारियों को इस योजना से जोड़ती हैं जो पहले से काम कर रहे हैं। इसलिए दावे से नहीं कह सकते हैं कि यह नया रोज़गार है।
Saturday, 20 January 2018
कोरेगांव में महारों की बहादुरी का सम्मान प्रधानमंत्री मोदी को भी करना चाहिए
फ्रांस में ब्रिटिश सरकार के लिए शहीद भारतीय सैनिकों को सलामी दी जा सकती है तो भीमा कोरेगांव के महार सैनिकों को क्यों नहीं?
अप्रैल 2015, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के लिल ( LILLE) स्थित NEUVE-CHAPELLE युद्ध स्मारक गए थे। वहां जाकर उन्होंने ब्रिटिश सेना की तरफ से फ्रांस की ज़मीन पर मारे गए 10,000 भारतीय सैनिकों की शहादत को सलामी दी थी। ऐसा करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने कहा था कि “हमारे जवानों ने विश्व युद्ध में विदेश ज़मीन पर लड़ाई लड़ी। अपनी निष्ठा, बहादुरी और त्याग के लिए दुनिया की प्रशंसा हासिल की। मैं उन्हें सलाम करता हूं। “
प्रधानमंत्री मोदी भारतीय सैनिकों की जिस निष्ठा और बहादुरी को सलाम कर रहे थे वो ब्रिटिश हुकूमत के प्रति थी न कि हिन्दुस्तान के प्रति। किसी भी लिहाज़ से प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम साहसिक था और अच्छा था। उन्हें याद नहीं रहा होगा वरना सबसे पहले वही कोरेगांव जाकर महार सैनिकों की बहादुरी का सम्मान करते।
कोरेगांव में ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए महार जाति के सैनिकों की बहादुरी का जश्न मनाने पर आपत्ति करने वालों को यह किस्सा ध्यान में नहीं रहा होगा। मैंने कई जगहों पर पढ़ा है कि महार जाति के सैनिक अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए लड़े थे। उनकी वीरता का गौरव गान आज कैसे हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी जब ब्रिटिश सेना में शामिल भारतीय जवानों की वीरता का सम्मान कर सकते हैं तो फिर कोरेगांव की गाथा का भी सम्मान सबको करना चाहिए। मराठा को भी, चितपावनों को भी और प्रधानमंत्री को सबसे पहले। उस जलसे में जिग्नेश के साथ प्रधानमंत्री को भी मंच साझा करना चाहिए था।
इतिहास हमारी दुविधा का इम्तहान ले रहा है। इसका एकमात्र कारण यह है कि जब इतिहास पढ़ने का वक्त होता है, तब हम उसे हिकारत की निगाह से देखते हैं। एक फालतू विषय समझते हैं। जब राजनीति के लिए इतिहास का इस्तमाल होता है, तब हम ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे इतिहास में आचार्य की डिग्री ली हो।
बहुत साल पहले मैंने 1857 की क्रांति पर एक स्पेशल रिपोर्ट तैयार किया था। उस रिपोर्ट में मेरठ के डाक्टर और इतिहासकार और झांसी की मिसेज कैंटम के प्रयासों की चर्चा थी। इन लोगों ने 1857 की क्रांति में मारे गए ब्रिटिश अफसरों और उनकी पत्नियों के कब्रिस्तान को फिर से ठीक ठाक कर दिया था। इन कब्रों को 1857 से जुड़ी स्मृतियों के नक्शे पर ला दिया था। उन कब्रों पर अंग्रेज़ अफ़सर और उनकी पत्नियों के साथ हुई हिंसा की दास्तान लिखी है। आज भी ब्रिटेन से उन अफसरों के ख़ानदान के नाती पोता जत्थे में आते हैं और इन कब्रों का दर्शन करते हैं।
इतिहास का अपराध बोध किसी भी समाज को जकड़ लेता है। वह इतिहास को समझने लायक नहीं रह जाता है। नासमझमी में वह वर्तमान से इतिहास का बदला लेने लगता है। इतिहास विषय की ट्रेनिंग से मैं इस अपराध बोध से उबर सका कि मैंने कोई ग़लती नहीं की है। इतिहास को हमेशा नए नए नज़रिए से देखते रहना चाहिए। सच बात यह है कि जब मैंने यह रिपोर्ट की थी तब लगा कि मुझसे कोई अपराध हो गया है। मुझे खुशी है कि मैंने वो रिपोर्ट की। सिपाहियों पर भी अलग से की।
यह सही है कि 1857 में ब्रिटिश सेना ने कई हज़ार भारतीयों को तोप से उड़ा दिया था। पेड़ से लटका दिया था। दिल्ली में लाल किला और जामा मस्जिद के इलाके में रहने वाले हज़ारों हिन्दुस्तानियों को उड़ा दिया था। यह भी सही है कि जवाबी हमले में ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों और पत्नियों पर भी ज़ुल्म
ढाए गए।
मेरठ के सेंट जॉन सेमिट्री में मैंने देखा कि ईस्ट इंडिया कंपनी के बहादुर अफसर गिलेस्पी की कब्र पर लोग फूल अगरबत्ती चढ़ाते हैं और मन्नतें मांगते हैं। गिलेस्पी की बहादुरी के हिसाब से उसकी क़ब्र काफी भव्य और विशाल है। इन सभी पहलुओं का ज़िक्र करना वतन के साथ गद्दारी नहीं बल्कि इतिहास के साथ एक अच्छा इंसाफ है। इतिहास का मतलब होता है जो हुआ है उसे जानना।
गोदी मीडिया के गुंडा एंकरों और चाटुकार राजनीतिक पत्रकारों ने इस बात का मज़ाक उड़ाया है कि ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए कोई बहादुरी का गौरव गान कैसे कर सकता है। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा के समय दी गई सलामी याद नहीं रही। प्रथम विश्व युद्ध में 11 भारतीयों को विक्टोरिया क्रास मिला था जिनमें से छह फ्रांस और फ्लैंडर्स में लड़ते हुए शहीद हो गए थे। हाल ही में एक फिल्म आई थी डनकर्क। इस फिल्म में भारतीय सैनिकों का पक्ष न दिखाए जाने की बहुत आलोचना हुई थी। इस बात के बावजूद फिल्म बेहद शानदार थी।
इतिहास की किसी घटना को आप मौजूदा पहचान की राजनीति का हिस्सा बनाएंगे तो समस्याएं पैदा होंगी। आनंद तेलतुम्बडे इस बारे में विस्तार से लिखा है कि भीमा कोरेगांव की घटना बहादुरी की मिसाल है मगर इसे अन्य मिसालों का प्रतीक बनाना भी एक तरह से मिथक रचना है। पर यह मिथक नकाबिलके बर्दाश्त अब क्यों हो रहा है. तीन साल से तरह तरह के मिथक बनाए जा रहे हैं। महाराणा प्रताप और रानी पदमिनी के इतिहास के साथ राजस्थान में जो हुआ वह भीमा कोरेगांव की घटना के इतिहासबाज़ी से कैसे अलग है।
अगर एक जाति विशेष को एक फिल्म के बहाने तमाम तरह के मिथकों के ऐतिहासक बना देने का दावा सही है तो एक जाति विशेष को अपने इतिहास के शानदार किस्से से नए नए मिथकों के गढ़ने की छूट क्यों नहीं है? इस अंतहीन सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं है। इतिहास को गौरव गाथा की किताब में आप जिनता समेटेंगे, अपना वर्तमान उतना ही संकुचित करेंगे। इस गौरव का कुछ इलाज कीजिए।
अगर आप वाकई भीमा कोरेगांव की घटना के बारे में जानना चाहते हैं कि 4 जनवरी के इंडियन एक्सप्रेस में गिरिश कुबेर और सुहास पलशिकर का लेख पढ़ सकते हैं। वायर में आनंद तेलतुम्बडे का लेख सबसे अच्छा है। फिर उसके बाद इस बहस में कूदिए।
Saturday, 2 December 2017
ग्लोबल व्यापार का इतिहास है सोमनाथ का
1026 में सोमनाथ मंदिर पर महमूद ग़ज़नी हमला करता है। इस घटना को लेकर आज तक नई नई व्याख्याएं होती रहती हैं और उस पर धारणाओं की परतें चढ़ाई जाती रहती हैं। उस वक्त भी और उसके बाद की सदियों में सोमनाथ मंदिर को लेकर अलग अलग लिखित ग्रंथों में दर्ज किया जाता है। फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, जैन, राजपूत दरबारों की वीर-गाथाएं, ब्रिटिश शासक और इतिहासकार, स्वतंत्रता आंदोलन के दौर के राष्ट्रवादी नेता। ये सब सोमनाथ को लेकर स्मृतियां गढ़ रहे थे। इतिहासकार रोमिला थापर ने इन अलग अलग ग्रंथों, दस्तावेज़ों और इतिहास लेखन में सोमनाथ मंदिर की घटना को कैसे दर्ज किया गया है, उसका अध्ययन किया है। वो पहले ही साफ कर देती हैं कि घटना क्यों हुई, किस मकसद से हुई, इसकी पड़ताल नहीं कर रही हैं बल्कि उसके बाद वो कैसे स्मृतियों और इतिहासलेखन में दर्ज होती है, उसे समझने का प्रयास कर रही हैं।
सोमनाथ मंदिर को लेकर जो धारणाएं बनती हैं या बनाई जाती हैं, जो दावे किए जाते हैं, उन्हीं सबको हम नैरेटिव, वृतांत या उससे भी सरल बहस कहते हैं। रोमिला थापर कहती हैं कि मैं यह देखना चाहती हूं कि यह घटना किस तरह स्मृतियों में प्रवेश करती है, वहां उसका स्वरूप कब कब कैसे कैसे बदलता है और यही यात्रा इतिहासलेखन के ज़रिए यह घटना कैसे तय करती है। क्यों लोगों की स्मृतियों का सोमनाथ, इतिहासलेखन में दर्ज सोमनाथ से अलग है। इसे समझने की ज़रूरत है। आप देख ही रहे हैं, आपके समय में भी इतिहास को लेकर यही होता रहा है। हमने अतीत में ही स्मृतियों को इतिहास की तरह नहीं गढ़ा है बल्कि अब तो हम टीवी के सामने बैठकर इतिहास की नई नई स्मृतियों को गढ़ रहे हैं। रानी पद्मावती के बारे में कह रहा हूं। रोमिला थापर की यह किताब 2004 में आई थी। SOMNATH- The Many Voices of a History , पेंग्विन इंडिया से छपी यह किताब तब 375 रुपये की थी।
अगर मंदिर कई बार टूटा और बना तो तोड़ने वाले कौन थे और प्रभावित होने वाले कौन थे। दोनों के बीच क्या संबंध थे और क्या विध्वंस या पुनर्निमाण के बाद दोनों के संबंध बदलते हैं? क्या सिर्फ इसमें दो ही पक्ष थे जिसे हम आमतौपर मुस्लिम और हिन्दू समझते हैं या दो से ज़्यादा पक्ष थे? तुर्क-फारसी दस्तावेज़ों में जो उस वक्त की ग़ज़नवी राजनीति को दर्ज कर रहे थे इस घटना को उस समय और उसके बाद के समय में अलग अलग तरीके से महत्व दिया गया है। शुरू में सोमनाथ मंदिर में किसी मूर्ति थी इस पर ज़ोर नहीं है, कितना धन था, इस पर है। बाद में इस घटना को भारत में इस्लामिक शासन की बुनियाद डालने के रूप में दर्ज किया जाता है। वो दौर पश्चिम और मध्य एशिया में अशांति का था,बग़दाद में ख़लिफ़ा को चुनौती दी जा रही थी, इस्लामिक जगत में बहुत कुछ हो रहा था। तुर्क वहां से निकल अपना विस्तार कर रहे थे।
घटना के 400 साल बाद के संस्कृति दस्तावेज़ों में इस बात का ज़िक्र है कि सोमनाथ मंदिर सिर्फ मंदिर नहीं था, उस वक्त अपने इलाके का राजनीतिक प्रशासक था जो फारसी व्यापारियों को कारोबार करने का परमिट भी जारी करता था। फारसी व्यापारियों से संबंध बहुत मधुर थे। 1951 में वहां उत्खनन होता है जिससे कई बार धारणाओं पर विराम लगता है। टूटने के बाद जो निर्माण होता है उससे पता चलता है कि मंदिर कई बार नहीं बल्कि तीन बार टूटा या तोड़ा गया। जबकि धारणाओं में मंदिर का विध्वंस कई बार होता है। उत्खनन से यह भी पता चलता है कि ग्रंथों में जिस तरह से मंदिर को विशाल रूप में दर्ज किया गया है, वास्तविक रूप उससे काफी अलग है। जैन व्यापारियों और दरबारी लेखकों के दस्तावेज़ों में भी मंदिर को लेकर अलग-अलग बातें मिलती हैं। 19 वीं सदी के शुरू में महमूद ग़ज़नी को लेकर जो मौखिक किस्से हैं उनका संग्रह किया जाता है, उन किस्सों से अलग ही इतिहास पता चलता है। आपको यही समझना है हर किस्सा इतिहास नहीं होता मगर वो इतिहास का हिस्सा हो जाता है। इतिहास वहीं तक है जहां तक प्रमाण हैं। बाकी किस्सों का इतिहास है मगर एक वो वास्तविक इतिहास नहीं है। क्योंकि कई किस्सों में पीर, फ़क़ीर, साधु और गुरु महमूद की तारीफ़ भी करते हैं। रोमिला थापर इन अलग अलग किस्सों को आमने-समाने रखकर सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनर्निमाण के इतिहास को समझने का प्रयास कर रही हैं। क्या इस घटना को भारत के अलग अलग समुदायों ने अलग-अलग निगाहों से देखा, क्या हमला सिर्फ धार्मिक शत्रुता के कारण हुआ, क्या राजनीतिक कारणों से इस घटना को बढ़ा-चढ़ा कर दर्ज किया जाता रहा है?
इन सब सवालों की पड़ताल करते हुए रोमिला थापर बेहद सरल और तरल अंग्रेज़ी में आपके लिए यह किताब लिखती हैं। पिछले सौ सालों में सोमनाथ और महमूद ग़ज़नी को लेकर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं। रोमिला हैरानी ज़ाहिर करती हैं कि इतने सारे लेखन के बाद भी संस्कृत ग्रंथों में सोमनाथ की घटना कैसे दर्ज है, इस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
19 वीं सदी में ब्रिटिश हाउस ऑफ कामंस में सोमनाथ मंदिर को लेकर ख़ूब बहस होती है, यहीं से वो नैरिटव मज़बूत होकर निकलती है कि महमूद ग़ज़नी के हाथों हिन्दुओं ने काफी प्रताड़ना झेली है। इस बहस के दौरान हिन्दू और मुस्लिम पीड़ित और आक्रांता की तरह उभरते हैं। यह पक्ष इतिहास की बाक़ी वास्तविकताओं पर हावी हो जाता है। रोमिला थापर लिखती हैं कि ज़्यादातर लेखन में मुस्लिम दस्तावेज़ों को ही महत्व दिया जाता है। गुजरात में चालुक्य राज के इतिहासकार ए के मजुमदार कहते हैं कि हिन्दू दस्तावेज़ों में मंदिर के विध्वंस की घटना को महत्व ही नहीं दिया गया है। जो भी लिखा गया है वह मुस्लिम दस्तावेज़ों के आधार पर। बीसवीं सदी में आज़ादी के बाद और ख़ासकर बाबरी मस्जिद ध्वंस के आस-पास से सोमनाथ मंदिर को लेकर फिर से विध्वंस का नैरेटिव हावी हो जाता है। 1951 में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण होता है। इसके पीछे के एम मुंशी का बहुत बड़ा प्रयास था। उनकी सोमनाथ पर किताब भी है।
सोमनाथ भी त्रिवेणी के संगम पर है। इस जगह को प्रभास (prabhasa) भी कहते हैं। यहां पर चंद्रगुप्त मौर्य के ईरानी गवर्नर ने सिंचाई के लिए बांध का निर्माण किया था, जो भारत में सिंचाई के लिए बांध बनाने के शुरूआती उदाहरणों में से एक है। उस ईरानी गवर्नर के ईरान से भी अच्छे संबंध थे। अशोक के शिलालेख भी यहां गिरनार में मिलते हैं। सातवीं सदी में ह्वेन सांग काठियावाड़ की यात्रा के दौरान लिखता है कि यहां बौद्ध मठों की संख्या कम होने लगी है, शैव और वैष्णवों की संख्या बढ़ने लगी है। ह्वेन सांग प्रभास में किसी मंदिर का ज़िक्र नहीं करता है। 19 वीं सदी के शुरू में ऐतिहासिक स्थलों का सर्वे करते हुए w.postan ने लिखा था कि सोमनाथ का मंदिर बौद्ध ढांचे पर बना था। जिसकी कभी पड़ताल नहीं हुई, रोमिला थापर कहती हैं कि इसकी पड़ताल की जा सकती थी। आठवीं सदी में सौराष्ट्र के वलाभी में अरबों का हमला होता है,वहां के शासक उस उस आक्रमण का मुकाबला करते हैं और रोक देते हैं। बाद में अरब हमलावार व्यापारी के रूप में बसने लगते हैं और विजय की इच्छा का त्याग कर देते हैं। गुजरात के सुदूर दक्षिण में राष्ट्रयुक्त के ग्रांट यानी अनुदानों से पता चलता है कि बौद्ध, जैन मतावलंबियों के साथ साथ अरबों को भी ग्रांट मिलता है।
वी के जैन ने अपनी किताब Trade and Traders in Western India में लिखा है कि ये अरब स्थानीय संस्कृति में रच-बस गए और स्थानीय लोगों से वैवाहिक संबंध भी बनाया। इनका ओमान, बसरा, बग़दाद और यमन से व्यापारिक लिंक बना रहा।संस्कृत के दस्तावेज़ों में अरबों का ज़िक्र ‘ताजिक’ के रूप में है, जिन्हें स्थानीय प्रशासक के रूप में भी दर्ज किया गया है। ये लोग उस इलाके के शासक राष्ट्रयुक्तों के गवर्नर भी बनाए जाते हैं। एक ज़िक्र यह भी मिलता है कि राष्ट्रयुक्त राजा ने एक ताजिक गवर्नर को मुंबई के उत्तर स्थित आज के संजन का प्रभारी बना दिया था, इस गवर्नर ने एक गांव को मंदिर बनाने के लिए अनुदान भी दिया था।
सोमनाथ मंदिर जहां हैं वहां समुद्र के कारण कई तरह की गतिविधियां हो रही थीं। काफी चहल-पहल का इलाका था। सौराष्ट्र में कभी कोई बड़ा राजवंश नहीं रहा। छोटे और मध्यम स्तर के राजा ही रहे हैं। नौवीं सदी का सैंधव सामंत( समझने के लिए छोटा राजा भी कह सकते हैं) सोमेश्वर के एक ब्राह्मण को ज़मीन दान देता है। ग्रांट के रूप में यह दर्ज है। इसी में ज़िक्र है कि प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय सौराष्ट्र में तीर्थ के लिए आता है, सौमेश्वर भी जाता है। मगर इन सबमें किसी में सोमनाथ के मंदिर का ज़िक्र नहीं है। बहुत बाद के दस्तावेज़ों में हेमचंद्र ने लिखा है कि जूनागढ़ के राजा तीर्थयात्रियों को प्रभास जाने से रोक दिया है। उसने ब्राह्मणों की हत्या की है, पवित्र स्थानों को भंग कर दिया है और बीफ खा लिया है। रोमिला कहती हैं कि शत्रुओं के बारे में कई बार इस तरह की बातें बना दी जाती थीं।
रोमिला थापर अपनी किताब में जो भी कह रही हैं, उसी पन्ने के नीचे उसका प्रमाण भी देती हैं कि कहां से उन्हें यह बात पता चली है। हम यहां साफ कर दें कि रोमिला थापर की कोई सेना नहीं हैं। आप उनकी किताब में लिखी गई बातों को न मानना चाहें तो बिल्कुल डरने की ज़रूरत नहीं हैं। वह कुछ नहीं करेंगी। मैंने उन्हीं का लिखा हुआ हिन्दी में पेश कर रहा हूं। रोमिला लिखती हैं कि एक जगह यह लिखा हुआ है किन भगवान सोम ने चालुक्य राजा मुलाराजा से कहा कि वह जूनागढ़ के राजा ग्रहारिपु को परास्त करे और प्रभास को उसके चंगुल से मुक्त करे। मुलाराजा ने यही किया और सोमेश्वर जाकर पूजा की। 10 वीं से 13 वीं सदी तक गुजरात में चालुक्य ही बड़े शासक थे, जिन्हें आज का सोलंकी कहा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि मुलाराजा ने ही सोमनाथ मंदिर का निर्माण कराया। मुलाराजा 997 में मर गए थे। मंदिर से मुलाराजा के संबंध होने के बहुत ठोस प्रमाण नहीं मिलते हैं, हो सकता है उन्होंने किसी छोटे मंदिर का पुनर्निमाण कराया हो। अगर मुलाराजा ने प्रभास में सोम का मंदिर बनाया भी होगा तो वह छोटा ही होगा क्योंकि अन्य जगहों पर उनके बनाए मंदिर छोटे ही हैं।
दसवीं सदी से सोमनाथ मंदिर के होने के स्पष्ट प्रमाण मिलने लगते हैं। अल बरूनी अपने संस्मरणों में ज़िक्र करता है, शाही तीर्थ यात्राओं में ज़िक्र आने लगता है। मंदिर के उत्खनन से भी यही समय साबित होता है। दसवीं सदी से पहले सोमनाथ के शिव मंदिर का ज़िक्र नहीं मिलता है। उस वक्त के सामंतों, ज़मींदारों जैसे वघेला, चुदास्मा, अभिहार, चावड़ा आदि की भूमिका मंदिर के प्रति बहुत सकारात्मक नहीं दिखती है। वे मंदिर प्रशासन और तीर्थयात्रियों को तंग करते हैं। काठियावाड़ के शासक की चालुक्य राजाओं से काफी शत्रुता रहती थी। रोमिला थापर गुजरात स्टेट गजेट के हवाले से लिखती हैं कि रनकादेवी की शादी चालुक्य राजा से होनी थी मगर किसी मामूली राजा से शादी हो जाती है। चालुक्य राजा जयसिम्हा नवघाना पर हमला कर देता है और रनकादेवी को अपने कब्जे में ले लेता है। रास्ते में रनकादेवी सती हो जाती हैं। H.C.RAY DYNASTIC HISTORIES OF NORTH INDIA में लिखते हैं कि अभिरा राजाओं को लूटपाट के कारण मलेच्छ कहा जाता था।
1000 से 1300 के बीच व्यापार के कारण गुजरात में काफी समृद्धि आती है। समृद्धि का यह दौर गुजरात को ग्लोबल बना देता है। यह वही समय है जब महमूद ग़ज़नी का हमला हो चुका था। अल बरूनी कहता है कि उस हमले के बाद वहां की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई मगर रोमिला थापर कहती हैं कि ऐसा नहीं हुआ। चालुक्य राजाओं के अलावा गुजरात में व्यापारियों ने भी सिंचाई के खूब संसाधन बनवाए। इस कारण सूखाग्रस्त सौराष्ट्र इलाके में खेती में भी काफी तरक्की हुई। चालुक्य राजा सोमनाथ पाटन पर छोटे-छोटे राजाओं के आक्रमण से परेशान रहते थे। वे तीर्थयात्रियों से टैक्स भी लेते थे और उन्हें लूटते भी थे। समुद्री यात्रा के दौरान लूट-मार की घटना आम थी। इसके बाद भी हर तरह से सोमनाथ आंतरिक और सामुद्रिक व्यापार का एक बड़ा केंद्र था। 9वीं से 15 वीं सदी का समय इस इलाके की अपार समृद्धि का समय था। वहां पर अलग अलग धर्मों और जगहों से लोग आकर बस रहे थे, कारोबार कर रहे थे और हर तरह का रिश्ता बना रहे थे।
रोमिला थापर यह भी लिखती हैं कि 12वीं सदी में महमूद गौरी हमला करता है तो एक हिन्दू व्यापारी वासा अभिहार की संपत्ति ज़ब्त नहीं कर पाता क्योंकि उसका ग़ज़नी मे भी काफी बड़ा कारोबार था। ग़ज़नी एक इलाक़े का नाम है। 14 वीं सदी में एक जैन व्यापारी जगादु ने अपने व्यापारी हिस्सेदार के लिए मस्जिद का निर्माण कराया था। ये सब अपवाद नहीं थे। व्यापारिक कारण रहे होंगे मगर एक दूसरे की संस्कृतियों और आस्थाओं को जगह देने की भावना काफी मज़बूत थी। मार्को पोलो ने भी लिखा है कि सोमनाथ के लोग व्यापार पर आश्रित हैं। होर्मुज़ से क़ीमती घोड़े का कारोबार ख़ूब होता था। भारत के घोड़े अच्छी नस्ल के नहीं होते थे। पश्चिम और मध्य एशिया से कारोबार बढ़ने के कारण उस वक्त के भारत को काफी फायदा हुआ था। इसके कारण होर्मुज और ग़ज़नी जैसे शहरों में भारतीय व्यापारियों के एजेंट भी जाकर बसे। उनका इतिहास खोजा जाए तो कितना दिलचस्प किस्सा निकलेगा। इस दौर में जैन व्यापारी काफी प्रभावशाली हुए और खूब सारे जैन मंदिरों का निर्माण करवाया।
15 वीं सदी से सोमनाथ से व्यापार का केंद्र बदलने लगा। उत्तर पश्चिम दर्रों से व्यापार होने लगा, अरब के व्यापारी सीधे उन रास्तों से आकर कारोबार करने लगे। उन्हें अब बिचौलियों की ज़रूरत नहीं थी। व्यापार के घटने का असर मंदिरों पर दिखने लगा जिन्हें काफी फायदा पहुंचा था। कहा जाता है कि इन्हीं हमलो के कारण व्यापार घट गया। हमले ज़रूर हुए मगर हमलों के कारण व्यापार नहीं घटा। अमीर मंदिरों पर हमले कभी कभार ही हुए। फारसी दस्तावेज़ों में बार बार बताया जाता है कि सोमनाथ को मस्जिद में बदल दिया गया है लेकिन रोमिला थापर कहती हैं कि इन हमलों के बाद भी कभी वहां होने वाली पूजा में रूकावट नहीं आई। वे नहीं मानती कि सोमनाथ को मस्जिद में बदला गया था। उस वक्त गुजरात में बसने वाले ज़्यादतर इस्माइली मुस्लिम थे, जिनकी अपनी मस्जिदें होती थीं। सुन्नी मुस्लिमों का इस्माइलियों ने काफी विरोध किया था। खोजा मुस्लिम इस्माइलियों के करीब थे, बोहरा मुस्लिम वैष्णवी परंपरा के करीब लगते थे। वे अवतार की परंपरा को मानते हैं और हिन्दू वसीयतों का पालन करते थे। दोनों का सल्तनत राजनीति में काफी वर्चस्व बढ़ गया था।
आपने देखा कि शुरू में तुर्क हमलावर बनकर आए, बाद में कारोबारी हो गए। जल्दी ही उनका इरादा बदल गया और वे उस इलाके की व्यापारिक समृद्धि का हिस्सेदार बने। खोजा, बोहरा और इस्माइली, तुर्क मुसलमानों से काफी अलग थे। एकतरफा व्यापारिक रिश्ता नहीं था। जैन व्यापारियों ने भी उसी तरह खाड़ी के देशों में अपना दबदबा बढ़ाया। रोमिला थापर लिखती हैं कि खाड़ी के देशों में जाने वाले भारतीयों ने कुछ लिखा हुआ नहीं छोड़ा कि उन्होंने वहां क्या देखा, अगर होता तो कितनी दिलचस्प बातें पता चलती कि उनके यहां से लोग भारत आकर क्या देख रहे हैं और भारत के लोग अरब जाकर क्या देख रहे हैं। काश, लिखा होता। कितनी भ्रांतियां दूर हो जातीं।
अब लेख काफी लंबा हो गया है। इसलिए रोक रहा हूं। अगली बार आगे का हाल लिखूंगा। अभी तक मैंने 36 पन्ने ही पढ़े हैं। 200 पेज का पढ़ना बाकी है। इतिहास का तलवार के दम पर नहीं पढ़ा जाता है। उसके लिए पन्ने पलटे जाते हैं।
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