Wednesday, 26 September 2018

90,000 करोड़ की डिफाल्टर IL&FS कंपनी डूबी तो आप भी डूबेंगे

IL&FS ( INFRASTRUCTURE LEASING AND FINANCIAL SERVICES) का नाम बहुत लोगों ने नहीं सुना होगा। यह एक सरकारी क्षेत्र की कंपनी है जिसकी 40 सहायक कंपनियां हैं। इसे नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी की श्रेणी में रखा जाता है। जो बैंकों से लोन लेती हैं। जिसमें कंपनियां निवेश करती हैं और आम जनता जिसके शेयर ख़रीदती हैं। इस कंपनी को कई रेटिंग एजेंसियों से अति सुरक्षित दर्जा हासिल है। AA PLUS की रेटिंग हासिल है। इस कंपनी बैंको से लोन लेती है। लोन के लिए संपत्ति गिरवी नहीं रखती है। काग़ज़ पर गारंटी दी जाती है कि लोन चुका देंगे। चूंकि इसके पीछे भारत सरकार होती है इसलिए इसकी गारंटी पर बाज़ार को भरोसा होता है। मगर एक हफ्ते के भीतर इसकी रेटिंग को AA PLUS से घटाकर कूड़ा करकट कर दिया गया है। अंग्रेज़ी में इसे जंक स्टेटस कहते हैं। अब यह कंपनी जंक यानी कबाड़ हो चुकी है। जो कंपनी 90,000 करोड़ लोन डिफाल्ट करने जा रही हो वो कबाड़ नहीं होगी तो क्या होगी। ज़ाहिर है इसमें जिनका पैसा लगा है वो भी कबाड़ हो जाएंगे। प्रोविडेंड फंड और पेंशन फंड का पैसा लगा है। यह आम लोगों की मेहनत की कमाई का पैसा है। डूब गया तो सब डूबेंगे। इसमें म्युचुअल फंड कंपनियां भी निवेश करती हैं। काग़ज़ पर लिखे वचननामे पर बैंकों ने IL&FS और उसकी सहायक कंपनियों को लोन दिए हैं। अब वो काग़ज़ रद्दी का टुकड़ा भर है। इस 27 अगस्त से जब यह ग़ैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी तय समय पर लोन नहीं चुका पाई, डेडलाइन मिस करने लगी तब शेयर मार्केट को सांप सूंघ गया। 15 सितंबर से 24 सितंबर के बीच सेंसेक्स 1785 अंक गिर गया। नॉन बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के शेयर धड़ाम बड़ाम गिरने लगे। स्माल इंडस्ट्री डेवलपमेंट बैंक आफ इंडिया (SIDBI) ने IL&FS और उसकी सहायक कंपनियों करीब 1000 करोड़ का कर्ज़ दिया है। 450 करोड़ तो सिर्फ IL&FS को दिया है। बाकी 500 करोड़ उसकी दूसरी सहायक कंपनियो को लोन दिया है। सिडबी ने इन्साल्वेंसी कोर्ट में अर्ज़ी लगाई है ताकि इसकी संपत्तियां बेचकर उसका लोन जल्दी चुकता हो। एक डूबती कंपनी के पास कोई अपना पैसा नहीं छोड़ सकता वर्ना सिडबी भी डूबेगी। दूसरी तरफ IL&FS और उसकी 40 सहायक कंपनियों ने पंचाट की शरण ली है। इस अर्ज़ी के साथ उसे अपने कर्जे के हिसाब किताब को फिर से संयोजित करने का मौका दिया जाए। इसका मतलब यह हुआ कि जब तक इसका फैसला नहीं आएगा, यह कंपनी अपना लोन नहीं चुकाएगी। तब तक सबकी सांसें अटकी रहेंगी। अब सरकार ने इस स्थिति से बचाने के लिए भारतीय जीवन बीमा को बुलाया है। IL&FS में सरकार की हिस्सेदारी 40.25 प्रतिशत है। भारतीय जीवन बीमा की हिस्सेदारी 25.34 प्रतिशत है। बाकी भारतीय स्टेट बैंक, सेंट्रल बैंक और यूटीआई की भी हिस्सेदारी है। हाल के दिनों में जब आई डी बी आई पर नान परफार्मिंग एसेट NPA का बोझ बढ़ा तो भारतीय जीवन बीमा को बुलाया गया। भारतीय जीवन बीमा निगम के भरोसे कितनी डूबते जहाज़ों को बचाएंगे, किसी दिन अब भारतीय जीवन बीमा के डगमगाने की ख़बर न आ जाए। भारतीय जीवन बीमा निगम के चेयरमैन ने कहा है कि IL&FS को नहीं डूबने देंगे। IL&FS ग़ैर बैंकिंग वित्तीय सेक्टर की सबसे बड़ी कंपनी है। इस सेक्टर पर बैंकों का लोन 496,400 करोड़ है। अगर यह सेक्टर डूबा तो बैंकों के इतने पैसे धड़ाम से डूब जाएंगे। मार्च 2017 तक लोन 3,91,000 करोड़ था। जब एक साल में लोन 27 प्रतिशत बढ़ा तो भारतीय रिज़र्व बैंक ने रोक लगाई। सवाल है कि भारतीय रिज़र्व बैंक इतने दिनों से क्या कर रहा था। जबकि भारतीय रिज़र्व बैंक ही इन वित्तीय कंपनियों की निगरानी करता है। म्यूचुअल फंड का 2 लाख 65 हज़ार करोड़ लगा है। हमारे आपके पेंशन और प्रोविडेंड फंड का पैसा भी इसमें लगा है। इतना भारी भरकम कर्ज़दार डूबेगा तो क़र्ज़ देने वाले, निवेश करने वाले सब के सब डूबेंगे। IL&FS का ज़्यादा पैसा सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में लगा है। इसके डूबने से तमाम प्रोजेक्ट अधर में लटक जाएंगे। हुआ यह है कि टोल टैक्स की वसूली का अनुमान ज़्यादा लगाया गया मगर उनकी वसूली उतनी नहीं हो पा रही है। इससे प्रोजेक्ट में पैसा लगाने वाली कंपनियां अपना लोन वापस नहीं कर पा रही हैं। इन्हें लोन देने वाली IL&FS भी अपना लोन वापस नहीं कर पा रही है। हमने इस लेख के लिए बिजनेस स्टैनडर्ड और इंडियन एक्सप्रेस की मदद ली है। मुझे नहीं पता कि आपके हिन्दी अख़बारों में इस कंपनी के बारे में विस्तार से रिपोर्टिंग है या नहीं। पहले पन्ने पर इसे जगह मिली है या नहीं। दुनिया के किसी भी देश में सरकार की कोई कंपनी संकट में आ जाए और उसमें जनता का पैसा लगा हो तो हंगामा मच जाता है। भारत में ऐसी ख़बरों को दबा कर रखा जा रहा है। तभी बार बार कह रहा हूं कि हिन्दी के अख़बार हिन्दी के पाठकों की हत्या कर रहे हैं। सूचना देने के नाम पर इस तरह से सूचना देते हैं कि काम भर हो जाए। बस सरकार नाराज़ न हो जाए। लेकिन आम मेहनतकशन लोगों के प्रोविडेंड फंड और पेंशन फंड का पैसा डूबने वाला हो, उसे लेकर चिन्ता हो तो क्या ऐसी ख़बरों को पहले पन्ने पर मोटे मोटे अक्षरों में नहीं छापना चाहिए था?

Tuesday, 25 September 2018

2019 के चुनावी साल में मीडिया की लाश आपके घर आने वाली है, आपकी क्या तैयारी है

2019 के चुनाव में अब 9 महीने रह गए हैं। अभी से लेकर आख़िरी मतदान तक मीडिया के श्राद्ध का भोज चलेगा। पांच साल में आपकी आंखों के सामने इस मीडिया को लाश में बदल दिया गया। मीडिया की लाश पर सत्ता के गिद्ध मंडराने लगे हैं। बल्कि गिद्धों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी है कि लाश दिखेगी भी नहीं। अब से रोज़ इस सड़ी हुई लाश के दुर्गन्ध आपके नथुनों में घुसेंगे। आपके दिमाग़ में पहले से मौजूद सड़न को खाद देंगे और फिर सनक के स्तर पर ले जाने का प्रयास करेंगे जहां एक नेता का स्लोगन आपका स्लोगन हो जाएगा। मरा हुआ मीडिया मरा हुआ नागरिक पैदा करता है। इस चुनावी साल में आप रोज़ इस मीडिया का श्राद्ध भोज करेंगे। श्राद्ध का महाजश्न टीवी पर मनेगा और अखबारों में छपेगा। 2019 का साल भारत के इतिहास में सबसे अधिक झूठ बोलने का साल होगा। इतने झूठ बोले जाएंगे कि आपके दिमाग़ की नसें दम तोड़ देंगी। न्यूज़ चैनल आपकी नागरिकता पर अंतिम प्रहार करेंगे। ये चैनल अब जनता के हथियार नहीं हैं। सरकार के हथियार हैं। चैनलों पर बहस के नक़ली मुद्दे सजाए जाएंगे। बात चेहरे की होगी, काम की नहीं। चेहरे पर ही चुनाव होना है तो बॉलीवुड से किसी को ले आते हैं। प्रवक्ता झूठ से तमाम बहसों को भर देंगे। किसी सवाल का सीधा जवाब नहीं होगा। भरमाने का महायुद्ध चलेगा। भरमाने का महाकुंभ होगा। चलो इस जनता को अब अगले पांच साल के लिए भरमाते हैं। जनता झूठ की आंधियों से घिर जाएगी। निकलने का रास्ता नहीं दिखेगा। मीडिया उसे गड्ढे में गिरने के लिए धक्का दे देगा। जनता गड्ढे में गिर जाएगी। 2019 का चुनाव जनता के अस्तित्व का चुनाव है। उसे अपने अस्तित्व के लिए लड़ना है। जिस तरह से मीडिया ने इन पांच सालों में जनता को बेदखल किया है, उसकी आवाज़ को कुचला है, उसे देखकर कोई भी समझ जाएगा कि 2019 का चुनाव मीडिया से जनता की बेदखली का आखिरी धक्का होगा। टीवी की बहस में हर उस आवाज़ की हत्या होगी जो जनता की तरफ से उठेगी। छोटे से कैंपस में नकली जनता आएगी। वो ताली बजाएगी। चेहरे और नेता के नाम पर। कुर्सी फेंक कर चली जाएगी। हंगामा ही ख़बर होगा और ख़बर का हंगामा। मुद्दों की जगह प्रचार के चमत्कार होंगे। प्रचार के तंत्र के सामने लोकतंत्र का लोक मामूली नज़र आने लगेगा। धर्म के रूपक राजनीतिक नारों में चढ़ा दिए जाएंगे। आपके भीतर की धार्मिकता को खंगाला जाएगा। उबाला जाएगा। इस चुनाव में नेता आपको धर्म की रक्षा के लिए उकसाएंगे। हिन्दू मुस्लिम डिबेट चरम पर होगा। इस डिबेट का एक ही मकसद है। बड़ी संख्या में युवाओं को दंगाई बनाओ। दंगों के प्रति सहनशील बनाओ। उनके मां-बाप की मौन सहमति इन युवाओं को ऊर्जा देगी। भारत एक नए दौर में जा रहा है। हत्याओं के प्रति सहनशील भारत। बलात्कार के प्रति सहनशील भारत। बस उसकी सहनशीलता तभी खौलेगी जब अपराधी का धर्म अलग होगा। बलात्कार और हत्या की शिकार का धर्म अलग होगा तो कोई बात नहीं। धर्म से नहीं बहकेंगे तो पाकिस्तान के नाम पर बहकाया जाएगा। भारत में सांप्रदायिकता पारिवारिक हो चुकी है। मां बाप और बच्चे खाने की मेज़ पर सांप्रदायिकता से सहमति जताते हैं। नफ़रत सामाजिक हो चुकी है। इसी की जीत का साल होगा 2019। इसी की हार का साल होगा 2019। मुकाबला शुरू हुआ है। अंजाम कौन जानता है। मेरी समझ से 2019 का चुनाव जनता के नागरिक होने के बोध की हत्या का साल होगा। जनता खुद ही पुष्टि करेगी कि हां हमारी हत्या हो चुकी है और हम मर चुके हैं। अब हमें ज़ुबान की ज़रूरत नहीं है। अपनी आवाज़ की ज़रूरत नहीं है। प्रचंड प्रचार के संसाधनों के बीच आखिर जनता ज़िंदा होने का सबूत कैसे देगी। सबके बस की बात नहीं है झूठ की आंधी को समझना और उससे लड़ना। मुख्यधारा के प्राय सभी मीडिया संस्थानों का मैदान साफ है। सरकार के दावों को ज़मीन से जांचने वाले पत्रकार समाप्त हो चुके हैं। गोदी मीडिया के गुंडे एंकर आपको ललकारेंगे। आपके दुख पर पत्थर फेंकेंगे और आपके हाथ में माला देंगे कि पहना दो उस नेता के गले में जिसकी तरफदारी में हम चीख रहे हैं। जनता इस चुनाव में मीडिया हार जाएगी। मीडिया की चालाकी समझिए। वो चुनावी साल में अपनी री-ब्रांडिंग कर रहा है। उसे पता है कि जनता को मालूम है कि मीडिया गोदी मीडिया हो गया था। उसके एंकरों की साख समाप्त हो चुकी है। इसलिए बहुत तेज़ी से मीडिया हाउस अपनी ब्रांडिंग नए सिरे से करेंगे। सच को लेकर नए नए नारे गढ़े जाएंगे। मीडिया जनता के लिए आंदोलनकारी की भूमिका में आएगा। आप झांसे में आएंगे। ज़मीन पर जाकर दावों की परीक्षा नहीं होगी क्योंकि इसमें जोखिम होगा। सरकार को अच्छा नहीं लगेगा। भारत का मीडिया खासकर न्यूज़ चैनल भारत के लोकतंत्र की हत्या करने में लगे हैं। यकीन न हो तो यू ट्यूब पर जाकर आप इन पांच साल के दौरान हुए बहसों को निकाल कर देख लें। आपको पता चल जाएगा कि ये आपको क्या बनाना चाहते थे। आपको यह भी पता चलेगा कि जो बनाना चाहते थे, उसका कितना प्रतिशत बन पाए या नहीं बन पाए। आप कुछ नहीं तो प्रधानमंत्री मोदी के दो इंटरव्यू देख लीजिए। एक लंदन वाला और एक पकौड़ा वाला। आपको शर्म आएगी। अगर शर्म आएगी तो पता चलेगा कि आपके भीतर की नागरिकता अभी बची हुई है। अगर नहीं आएगी तो कोई बात नहीं। री-ब्रांडिंग के इस खेल में विश्वसनीयता खो चुके एंकरों से दूरी बनाने की रणनीति अपनाई जाएगी। चैनलों में काफी बदलाव होगा। एंकरों के स्लाट बदलेंगे। कार्यक्रम के नाम बदलेंगे। मुमकिन है कि इंटरव्यू के लिए नए एंकर तलाशे जाएं। हो सकता है मुझ तक भी प्रस्ताव आ जाए। यह सब खेल होगा। सत्ता इस्तमाल करने के लिए लोगों को खोज रही है। बहुत चालाकी से गोदी मीडिया आपको गोदी जनता में बदल देगा। जनता क्या कर सकती है? मेरी राय में उसे पहली लड़ाई खुद को लेकर लड़नी चाहिए। उसे 2019 का चुनाव अपने लिए लड़ना होगा। वह हिन्दी के अख़बारों को ग़ौर से देखे। दूसरे अख़बारों को भी उसी निर्ममता के साथ देखे। किस पार्टी का विज्ञापन सबसे ज़्यादा है। किस पार्टी के नेताओं का बयान सबसे ज़्यादा है। अखबारों के पत्रकार नेताओं के दावों को अपनी तरफ से जांच कर रहे हैं या सिर्फ उन्हें जस का तस परोसने की चतुराई कर रहे हैं। जब भी आप न्यूज़ चैनल देखें तो देखें कि प्रधानमंत्री की रैली कितनी बार दिखाई जाती है। कितनी देर तक दिखाई जाती है। उनके मंत्रियों की रैली कितनी बार दिखाई जाती है। कितनी देर तक दिखाई जाती है। फिर देखिए कि विपक्ष के नेताओं की रैली कितनी बार दिखाई जाती है। कितनी देर तक दिखाई जाती है। बात बार और देर की नहीं बात है कि मुद्दों को रखने की जिस पर नेता जवाब दें। न कि नेताओं के श्रीमुख से निकले बकवासों को मुद्दा बनाए। आपको पता चलेगा कि आने वाला भारत कैसा होने जा रहा है। मरे हुए मीडिया के साथ आप इस चुनावी साल में प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए इस मीडिया को परखिए। इम्तहान पत्रकार दे रहा है और प्रश्न पत्र की सेटिंग मालिक कर रहे हैं। इस खेल को समझने का साल है। इस चुनाव में न्यूज़ चैनल और अख़बार विपक्ष की हत्या करेंगे। विपक्ष भी अपनी हत्या होने देगा। वह अगर मीडिया से नहीं लड़ेगा तो आपके भीतर के विपक्ष को नहीं बचा पाएगा। आप देखिए कि विपक्ष का कौन नेता इस गोदी मीडिया के लिए लड़ रहा है। इस बार अगर आप नागरिकता के इस इम्तहान में हारेंगे तो अगले पांच साल ये मीडिया अपने कंधे पर आपकी लाश उठाकर नाचेगा। अपवादों से कुछ मत देखिए। इस देश में हमेशा कुछ लोग रहेंगे। मगर देखिए कि जहां बहुत लोग हैं वहां क्या हो रहा है। आपकी हार मैं जानता हूं, क्या आप अपनी जीत जानते हैं? 2019 के जून में इस पर बात होगी। मीडिया को मारकर आपको क्या मिलेगा, इस पर एक बार सोच लीजिएगा।

Thursday, 6 September 2018

नोटबंदी के समय उल्लू बने लोग हाज़िर हों, 99.30 पैसा बैंक में आ गया है

कल्पना कीजिए, आज रात आठ बजे प्रधानमंत्री मोदी टीवी पर आते हैं और नोटबंदी के बारे में रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट पढ़ने लगते हैं। फिर थोड़ा रूक कर वे 8 नवंबर 2016 का अपना भाषण चलाते हैं, फिर से सुनिए मैंने क्या क्या कहा, उसके बाद रिपोर्ट पढ़ते हैं। आप देखेंगे कि प्रधानमंत्री का गला सूखने लगता है। वे खांसने लगते हैं और लाइव टेलिकास्ट रोक दिया जाता है। वैसे कभी उनसे पूछिएगा कि आप अपने उस ऐतिहासिक कदम के बारे में क्यों नहीं बात करते हैं? भारतीय रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट आई है। नोटबंदी के बाद 99.30 प्रतिशत 500 और 1000 के नोट वापस आ गए हैं। नोटबंदी के वक्त 15.41 लाख करोड़ सर्कुलेशन में था। 15.31 लाख करोड़ वापस आ गया है। रिज़र्व बैंक ने कहा है कि वापस आए नोटों की सत्यता की जांच का काम समाप्त हो चुका है। तो व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के ज़रिए जो भूत पैदा किया गया कि नकली नोटों का जाल बिछ गया है। 1000 के नोट पाकिस्तान से आ रहे हैं। काला धन मार्केट में घूम रहा है। फिर हंगामा हुआ कि लोग अपना काला धन जन धन खाते में जमा कर रहे हैं। लाइन में जो ग़रीब लगा है, वो अपने पांच सौ हज़ार के लिए नहीं लगा है बल्कि वह काला धन रखने वाले अमीर लोगों का एजेंट है। तब तुरंत बयान आया कि इन खातों की जांच होगी और सब पकड़ा जाएगा। एक नया हिसाब इसका नहीं है। न तो चौराहे पर न ही दो राहे पर। व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से यह भी भूत पैदा गया कि जो ब्लैक मनी होगा वो बैंक में नहीं आएगा। उतना पैसा नष्ट हो जाएगा। इसतरह जिसके पास काला धन है वो नष्ट हो जाएगा। सारे दावे बोगस निकले हैं। जिनके पास पैसा था, उनके पास आज भी है। अगर काला धन ख़त्म हो गया होता तो राजनीति में ही उसका असर दिखता। नेताओं के पास रैली के पैसे नहीं होते। वैसे बीजेपी ने चुनावी ख़र्चे को सीमित किए जाने की राय का विरोध किया है। नोटबंदी के कारण लोगों के काम छिन गए। नौकरियां गईं। इन सब को चुनावी जीत के पर्दे से ढंक दिया गया । उस समय एक और बोगस तर्क दिया जाता था कि नोटबंदी के दूरगामी परिणाम होते हैं। दो साल होने को है, उन दूरगामी परिणामों का कोई लक्षण नहीं दिख रहा है। वैसे यह भी नहीं बताया गया कि दूरगामी परिणाम क्या क्या होंगे। तो आप क्या बने….ज़ोर से बोलिए..उल्लू बने। क्या अच्छा नहीं होता कि जिन जिन लोगों ने व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी की बातों से सपना देखा था, वो सभी बाहर आएं और कहें कि हां हम उल्लू बने। हम उल्लू थे, उल्लू रहेंगे। वैसे उल्लू बने बैंक वाले। उन्हें लगा कि देश सेवा की कोई घड़ी आ गई है। जब उन पर अचानक नोटों के अंबार गिनने का काम थोप दिया गया तो कई कैशियरों से हिसाब जोड़ने में ग़लती हुई। 20-30 हज़ार सैलरी पाने वाले बहुत से कैशियरों ने अपनी जेब से 5000 से लेकर 3-3 लाख तक जुर्माना भरा। ऐसे लोगों पर कई बार पोस्ट लिख चुका हूं। वो लोग भी चाहें तो बाहर आ सकते हैं कि कह सकते हैं कि हां हम उल्लू बने। आपको पता ही होगा कि आज (29.8.2018) रुपया ऐतिहासिक गिरावट पर है। एक डॉलर आज 70 रुपये 52 पैसे का हो गया।

Saturday, 18 August 2018

सिद्धू से खुश हुआ पाकिस्तान,इमरान की पार्टी ने डाला ऐसा ऑफर की भाजपा को नहीं पचेगा

नई दिल्ली।नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तान जाने को लेकर भारत में जमकर बवाल मचा हुआ है, इसी बीच पाकिस्तान से एक और बड़ी खबर आई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पीटीआई के एक सिनेटर ने सिद्धू को पाकिस्तान में चुनाव लड़ने का ऑफर दिया है। ये वाकया तब हुआ जब एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल नवजोत सिंह सिद्धू से उनके पाक यात्रा पर प्रतिक्रिया ले रहा था। पाकिस्तान आर्मी चीफ ने सिद्धू को लगाया गले दरअसल क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू, प्रधानमंत्री के रूप में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के प्रमुख इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने शुक्रवार को पाकिस्तान पहुंच गए। सिद्धू वाघा सीमा के जरिए लाहौर पहुंचे और शनिवार को शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। कार्यक्रम स्थल पर सिद्धू ने पीटीआई नेताओं से लंबी बातचीत भी की। इसी दौरान पाकिस्तान के सेना के चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा से सिद्धू गले भी मिले, जिसे लेकर भारत में राजनीति गरम है। पाकिस्तान से ही चुनाव लड़ लें सिद्धू साहब: फैसल जावेद इमरान खान के शपथ ग्रहण के बाद सिद्धू पाकिस्तानी मीडिया से भी रूबरु हुए। इसी दौरान पीटीआई के सिनेटर फैसल जावेद ने कहा कि इतना कमाल है कि अब हम सोच रहे हैं कि सिद्धू साहब यहीं से चुनाव लड़ जाएं। ये इतने फेसम हैं, इनकी मोहब्बत है। हर मसला टेबल पर बैठकर हल कर लेंगे। सिद्धू भाई का जो पैगाम है, वे बहुत पॉजिटिव है। सरहद पार कर बदले सिद्धू के सुर पाकिस्तान में सिद्धू ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी किया। भारत रवाना होने से पहले नवजोत सिंह सिद्दू ने कहा कि मैं मोहब्बत का एक पैगाम हिन्दूस्तान से लाया था। जितनी मोहब्बत मैं लेकर आया था, उससे 100 गुणा ज्यादा मोहब्बत मैं वापस लेकर जा रहा हूं। जो वापस आया है, वो सूद समेत आया है। मीडिया से बात करते हुए सिद्धू ने कहा कि ये हमारी ड्यूटी है कि हम वापस जाने के बाद अपने सरकार से कहे कि वो पाकिस्तान की ओर दोस्ती का एक कदम बढाए। मैं आशा करता हूं कि भारत सरकार के एक कदम पर पाकिस्तान की ओर से दो कदम बढ़ाए जाएंगे। जनरल बाजवा ने आज मुझसे गले मिलते हुए कहा कि हम शांति चाहते है। इसलिए हमे नीले समंदर में तैरना चाहिए न कि खून से रंगे लाल समंदर में। इमरान बदलेंगे पाक की किस्मत: सिद्धू वहीं पाकिस्तान के राष्ट्रीय चैनल ‘पीटीवी’ से बातचीत में सिद्धू ने इमरान की प्रशंसा की और कहा कि पाकिस्तान में नई सरकार के साथ एक नई सुबह हुई है। यह सरकार इस देश की किस्मत बदल सकती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच शांति प्रक्रिया में इमरान की जीत से लाभ होगा।

प्रेस की आज़ादी पर 300 अमरीकी अख़बारों के संपादकीय

अमरीकी प्रेस के इतिहास में एक शानदार घटना हुई है। 146 पुराने अख़बार बोस्टन ग्लोब के नेतृत्व में 300 से अखबारों ने एक ही दिन अपने अखबार में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर संपादकीय छापे हैं। आप बोस्टल ग्लोब की साइट पर जाकर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर लिखे गए 300 संपादकीय का अध्ययन कर सकते हैं। सबके संपादकीय अलग हैं। पत्रकारिता के विद्यार्थी को सभी संपादकीय पढ़कर उस पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट लिखना चाहिए। आप जानते हैं कि अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प जब तक प्रेस पर हमला करते रहते हैं। प्रेस के ख़िलाफ़ अनाप-शनाप बोलते रहते हैं। अमरीकी प्रेस ने जम कर लोहा लिया है। मैं न्यूयार्क टाइम्स और बोस्टन ग्लोब के संपादकीय का अनुवाद कर रहा हूं ताकि हिन्दी के युवा पत्रकार और पाठक अमरीकी प्रेस के मानस में झांक कर देख सकें। पहला न्यूयार्क टाइम्स का है- 1787 में जब संविधान का जन्म हुआ था, उस साल थॉमस जफरसन ने अपने मित्र को लिखा था कि अगर मुझ पर इसका फ़ैसला छोड़ा जाता कि सरकार हो मगर अख़बार न हो, अख़बार हो लेकिन सरकार न हो तो मैं एक झटके में दूसरे विकल्प को चुन लेता। जैफ़रसन की राष्ट्रपति बनने से पहले ये सोच थी। बीस साल बाद व्हाइट हाउस के भीतर से प्रेस को देखने के बाद उनके मन में इसके महत्व को लेकर भरोसा कुछ कम हो गया था। “अख़बार में जो छपता है उस पर कुछ भी विश्वास नहीं किया जा सकता है, इस प्रदूषित वाहन में डालने भर से सत्य संदिग्ध हो जाता है ।” जैफ़रसन के विचार अब ये हो जाते हैं। जैफ़रसन की असहजता समझी जा सकती है। एक खुले समाज में न्यूज़ की रिपोर्टिंग का उद्यम कई तरह के हितों के टकराव से जुड़ जाता है। उनकी असहजता से उन अधिकारों की ज़रूरत भी झलकती है जिसे उन्होंने संविधान में जोड़ा था। अपने अनुभवों से संविधान निर्माताओं को लगा था कि सही सूचनाओं से लैस जनता को भ्रष्टाचार मिटाने और आगे चलकर आज़ादी और न्याय को प्रोत्साहित करने में मदद मिलती है। सार्वजनिक बहस राजनीतिक कर्तव्य है। 1964 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था। यह बहस बिना किसी झिझक के खुले मन से होनी चाहिए। कई बार सरकार और सरकारी अधिकारियों पर जमकर हमले होने चाहिए, भले ही वो किसी को अच्छा न लगे। 2018 में सरकारी अधिकारियों की तरफ से ही प्रेस को लेकर क्षति पहुंचाने वाले हमले हुए हैं। किसी स्टोरी को कम दिखाने या ज़्यादा दिखाने को लेकर न्यूज़ मीडिया की आलोचना ठीक है। कुछ ग़लत छपा हो तो उसकी आलोचना ठीक है। न्यूज़ रिपोर्टर और संपादक भी इंसान हैं। उनसे ग़लतियां होती हैं। उन्हें ठीक करना हमारे पेशे का अहम हिस्सा है। लेकिन आपको जो सत्य पसंद नहीं है उसे फेक न्यूज़ कहना लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है। पत्रकारों को जनता का दुश्मन कहना भी ख़तरनाक है। अमरीका में छोटे अखबार आर्थिक संकट से गुज़र रहे हैं। देश भर के पत्रकारों की रक्षा के लिए बने कानून भी कमज़ोर हैं। ऐसे में प्रेस पर होने वाले ये हमले उनके लिए चुनौती बन गए हैं। इन सबके बाद भी इन अख़बारों के पत्रकार सवाल पूछने के लिए मेहनत किए जा रहे हैं और आप तक उन स्टोरी को पहुंचा रहे हैं जिनके बारे में आपको पता भी नहीं चलता। The San Luis Obispo Tribune ने जेल में बंद एक कैदी के बारे में रिपोर्ट छापी थी जिसे 46 घंटे तक रोक कर रखा गया था। इस रिपोर्ट ने देश को मजबूर कर दिया कि जेल में मानसिक रूप से बीमार कैदियों के इलाज में बदलाव लाया जाए। पिछले हफ्ते The Boston Globe का प्रस्ताव आया था कि उनके इस अभियान में कस्बों के छोटे अख़बारों से लेकर महानगरों के बड़े अख़बार शामिल हो रहे हैं। The Times भी इसमें शामिल हो गया ताकि हम अपने पाठकों को अमरीका के आज़ाद प्रेस के महत्व को याद दिला सकें। ये सभी संपादकीय एकजुट होकर अमरीकी संस्थान के बुनियाद को रेखांकित कर रहे हैं। अगर आपने इन संपादकीय को नहीं पढ़ा है तो प्लीज़ लोकल अखबारों को सब्सक्राइब करें, जब भी वे अच्छा काम करें, उनकी तारीफ करें और अगर लगे कि इससे भी अच्छा कर सकते हैं तो उनकी आलोचना करें। हम सब इसमें साथ हैं। न्यू यॉर्क टाइम्स का संपादकीय यहां समाप्त होता है। क्या भारत के बड़े अख़बार छोटे अख़बारों के हक में ऐसे संपादकीय लिख सकते हैं, क्या वे प्रेस की आज़ादी के अपने अभियान में छोटे अख़बारों को शामिल करते हैं? न्यू यार्क टाइम्स के इस संपादकीय से आपको झलक मिलती है कि हम लोकतांत्रिक मूल्यों को अभिव्यक्त करने में कितना पीछे हैं। इसलिए हिन्दी के पत्रकार जिनका जीवन हिन्दी के अखबारों में निश्चित ही नष्ट होने वाला है, उन्हें इसे पढ़ना चाहिए। कई बार स्वाध्याय ही नष्ट होने से बचा लेता है। अख़बार और पत्रकारिता नष्ट हो जाएगा मगर एक पढ़ा लिखा सचेत पत्रकार बचा रहेगा। वो बच जाएगा तो फिर कभी सब ठीक भी हो जाएगा। अब आप अमरीका के दि बास्टल ग्लोब अखबार की साइट पर जाएं। वहां इस अभियान के बारे में लिखा है। इस अख़बार ने उन सभी अखबारों के संपादकीय बोर्ड से संपर्क साधा जो उदार मूल्यों और प्रेस की आज़ादी में यकीन रखते हैं। “राष्ट्रपति ट्रंप की राजनीति के मुख्य केंद्र में आज़ाद प्रेस पर लगातार हमला करते रहना। पत्रकारों को अमरीकी नागरिक नहीं माना जाता है बल्कि उन्हें लोगों के दुश्मन की तरह पेश किया जा रहा है। आज़ाद प्रेस पर होने वाले निरंतर हमलों के ख़तरनाक परिणाम होंगे।इसलिए हमने देश भर के सभी छोटे और बड़े उदारवादी और रूढ़ीवादी अख़बारों के संपादकीय बोर्ड से संपर्क किया कि वे इन बुनियादी हमलों को लेकर अपने शब्दों में संपादकीय लिखें। ” जब देश में कोई भी भ्रष्ट सत्ता काबिज़ होती है तब उसका काम होता है कि आज़ाद प्रेस की जगह सरकार संचालित मीडिया को ले आए। आज अमरीका में हमारे पास एक ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने ऐसी सोच तैयार कर दी है कि मीडिया का जो हिस्सा मौजूदा प्रशासन की नीतियों को सपोर्ट नहीं करता है, वह जनता का दुश्मन है। राष्ट्रपति द्वारा फैलाए गए कई झूठ में से एक झूठ यह भी है। ” स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता अनिवार्य है।” जॉन एडम का यह सूत्र वाक्य 200 सालों से ज़्यादा अमरीकी सिद्धांतों का हिस्सा रहा है जिसने पत्रकारों की देश में रक्षा की है। दुनिया के अन्य देशों में प्रेस के लिए मॉडल का काम करता रहा है। आज इस पर गंभीर ख़तरा है। बीजिंग से बगदाद और अंकारा से लेकर मॉस्को तक के तानाशाहों की तरफ से ये सिग्नल लगातार दिया जा रहा है कि पत्रकारों को जनता का दुश्मन घोषित किया जा सकता है। स्वतंत्रत समाज के लिए प्रेस अनिवार्य है क्योंकि यह नेताओं पर आंख बंद कर भरोसा नहीं करता है। चाहे वो स्थानीय योजना बोर्ड के सदस्य हों या फिर व्हाईट हाउस के। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि मौजूदा राष्ट्रपति के वित्तीय मामलों में कई झोल हैं, जिनके संदिग्ध व्यावहारों के चलते उन्हीं के जस्टिस डिपार्टमेंट ने उनकी जांच के लिए एक स्वतंत्र वकील की नियुक्ति की है। अब ऐसे राष्ट्रपति ने उन पत्रकारों को धमकाने की बहुत कोशिश की है जो स्वंत्तर रूप से कई तथ्यों को सामने लाते हैं। अमरीका में सबके बीच एक स्थापित और निष्पक्ष सहमति रही है कि प्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसके बाद भी अब ऐसे बहुत से अमरीकन हैं जो इस मत को नहीं मानते हैं। इस महीने Ipsos ने एक सर्वे किया था जिसमें 48 फीसदी रिपब्लिक समर्थकों ने माना है कि न्यूज़ मीडिया अमरीकी जनता का दुश्मन है। एक और सर्वे में 51 फीसदी रिपब्लिकन ने प्रेस की तुलना जनता के दुश्मन से की है। लोकतंत्र का अहम हिस्सा नहीं माना है। ट्रंप के हमले से पता चलता है कि क्यों उनके समर्थक इस अलोकतांत्रिक रवैये का समर्थन करते हैं। एक चौथाई अमरीकी अब कहने लगे हैं कि राष्ट्रपति के पास ख़राब बर्ताव करने वाले प्रेस को बंद करने का अधिकार होना चाहिए। इस सर्वे में शामिल 13 फीसदी लोगों ने कहा है कि राष्ट्रपति को CNN, The Washington Post and The New York Times जैसे समाचार माध्यमों को बंद कर देना चाहिए। अपने समर्थकों को उकसाने वाला यह मॉडल बता रहा है कि 21 वीं सदी के तानाशाह रूस के पुतीन और तुर्की के एर्दोगन कैसे काम करते हैं। आपको सूचनाओं को रोकने के लिए आधिकारिक रूप से सेंशरशिप के एलान की ज़रूरत ही नहीं है। ट्रंप के समर्थक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उनका इशारा सिर्फ उस मीडिया की तरफ है जो तटस्थ नहीं हैं। वे सारे प्रेस के बारे में ऐसा नहीं कहते हैं। लेकिन राष्ट्रपति के अपने ही शब्द और उनका रिकार्ड बार बार यही बताता है कि समर्थकों के इस तर्क में कितनी बेईमानी है। अमरीकी के संस्थापकों ने इस बात को महसूस किया था कि प्रेस तटस्थ नहीं भी हो सकता है फिर भी उन्होंने संविधान में प्रेस और पत्रकारों की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया था। थॉमस जेफ़रसन ने लिखा था कि हमारी स्वतंत्रता प्रेस की स्वतंत्रता पर निर्भर करती है और उसकी कोई सीमा नहीं तय की जा सकती है। संविधान के संस्थापकों से लेकर सभी दलों के नेताओं को मीडिया से शिकायतें रही हैं। मीडिया पर आरोप लगाते रहे हैं लेकिन एक संस्थान के रूप में प्रेस का हमेशा सम्मान किया गया है। बहुत लंबे समय की बात नहीं है जब रिपब्लिकन राष्ट्रपति रोनल्ड रेगन ने कहा था कि मुक्त प्रेस की हमारी परंपरा हमारे लोकतंत्र का अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग रहा है और रहेगा। 1971 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ह्यूगो ब्लैक ने लिखा था कि प्रेस का काम शासित की सेवा करना है न कि शासक का। आज ट्रंप अपने साथ उसी मीडिया को लेकर ले जाते हैं जो उनके नेतृत्व की वकालत करता है। सवाल नहीं करता है। देखा जाए तो सिर्फ राष्ट्रपति ही अपने राजनीतिक और निजी फायदे के लिए लोगों में विभाजन नहीं कर रहे हैं। वे अपने समर्थकों से भी कहते हैं कि वो जो कह रहे हैं उसी का अनुकरण करें। पिछले महीने कंसास में उन्होंने कहा था कि बस हमारी सुनो, ये लोग( प्रेस) जो बकवास दिखाते हैं उस पर यकीन मत करो। इतना याद रखना कि जो आप देख रहे हैं या पढ़ रहे हैं वही सिर्फ नहीं हो रहा है। जार्ज ओरवेल ने अपने उपन्यास 1984 में कहा था कि “जो पार्टी आपको यह कहे कि अपनी आंखों और कानों के देखे-सुने सबूतों को मत मानो, यह उनकी तरफ से सबसे अनिवार्य और अंतिम फरमान है। ” George Orwell put it more gracefully in his novel “1984.” “The party told you to reject the evidence of your eyes and ears. It was their final, most essential command.” आज ट्रंप अपने समर्थकों को यही करने के लिए कहते हैं। अपने कार्यकाल के पहले 558 दिनों में उन्होंने 4,229 ग़लत दावे किए हैं। वाशिंगटन पोस्ट ने उनके झूठे दावों की सूची बनाई है। फिर भी ट्रंप के समर्थकों में मात्र 17 फीसदी ऐसे हैं जो मानते हैं कि अमरीकी प्रशासन लगातार झूठ बोलता रहता है। उनका झूठ ही तथ्य बनता जा रहा है। सूचनाओं से लैस नागरिकों के लिए झूठ उनके वजूद को नकारता है। अमरीका की महानता इस पर निर्भर है कि मुक्त प्रेस सत्ता के सामने खुलकर सत्य का बयान करे। प्रेस पर जनता का दुश्मन का लेबल चिपकाना अमरीकी पंरपरा नहीं है। दो सौ सालों जो जिस नागरिकता की साझा समझ हमने विकसित की है, उसके लिए यह फरमान ख़तरा है। दि बोस्टन ग्लोब का संपादकीय यहां समाप्त होता है। नोट- अच्छा होता कि कोई सभी तीन सौ संपादकीय का अनुवाद पेश करता है क्योंकि हर संपादकीय में अलग अनुभव और तथ्य हैं। इससे प्रेस की आज़ादी को लेकर हमारी समझ और विस्तृत होती है। हिन्दी के पाठकों और पत्रकारों के लिए मैंने अपनी छुट्टी के तीन चार घंटे लगाकर यहां अनुवाद किए हैं।यह इसलिए भी लिखा है ताकि आपको पता रहे कि इस तरह के काम में मेहनत लगती है। वक्त लगता है। सब कुछ फोकट में नहीं आता है। अगर आप चाहते हैं कि समाज बेहतर हो, तो अपने हिस्से का श्रमदान कीजिए। आने वाले दिनों में कुछ और संपादकीय का अनुवाद करूंगा।

Monday, 13 August 2018

एक कैंपस के भीतर 29 बच्चियों के साथ बलात्कार होता रहा, बिहार सोता रहा

बिहार के मुज़फ्फरपुर में एक बालिका गृह है। इसे चलाते हैं एन जी ओ और सरकार पैसे देती है। इस बालिका गृह में भागी भटकी हुई लड़कियों को ला कर रखा जाता है, जिनका कोई ठिकाना नहीं होता है, मां बाप नहीं होते हैं। इस बालिका गृह में रहने वाली लड़कियों की उम्र 7 से 15 साल के बीच बताई जाती है। टाटा इस्टिट्यूट ऑफ साइंस जैसी संस्था ने इस बालिका गृह का सोशल ऑडिट किया था जिसमें कुछ लड़कियों ने यौन शोषण की शिकायत की थी। उसके बाद से 28 मई को एफ आई आर दर्ज हुआ और कशिश न्यूज़ चैनल ने इस ख़बर को विस्तार से कवर किया। यहां रहने वाली 42 बच्चियों में से 29 के साथ बलात्कार और लगातार यौन शोषण के मामले की पुष्टि हो चुकी है। एक कैंपस में 29 बच्चियों के साथ बलात्कार का नेटवर्क एक्सपोज़ हुआ हो और अभी तक मुख्य आरोपी का चेहरा किसी ने नहीं देखा है। पुलिस की कार्रवाई चल रही है मगर उसी तरह चल रही है जैसे चलती है। मई से जुलाई आ गया और पुलिस मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर को रिमांड पर नहीं ले सकी। इस मामले को शिद्दत से कवर करने वाले संतोष सिंह को राजधानी पटना की मीडिया की चुप्पी बेचैन कर रही है। वे हर तरह से समझना चाहते हैं कि एक कैंपस में 29 बच्चियों के साथ बलात्कार का एक पूरा नेटवर्क सामने आया है जिसमें राजनीतिक, न्यायपालिका, नौकरशाही और पत्रकारिता सब धुल मिट्टी की तरह लोट रहे हैं फिर भी मीडिया अपनी ताकत नहीं लगा रहा है। रिपोर्टर काम नहीं कर रहे हैं। संतोष को लगता है कि पूरा तंत्र बलात्कारी के साथ खड़ा है। इस मामले को लेकर विधानसभा और लोकसभा में हंगामा हुआ है मगर रस्मे अदाएगी के बाद सबकुछ वहीं है। ख़बर की पड़ताल ठप्प है तब भी जब 11 में से 10 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। “जिस बालिका गृह में 42 में से 29 लड़कियों के साथ रेप हुआ हो, यह कैसे संभव है कि वहां हर महीने जांच के लिए जाने वाले एडिशनल ज़िला जज के दौरे के बाद भी मामला सामने नहीं आ सका। बालिका गृह के रजिस्टर में दर्ज है कि न्याययिक अधिकारी भी आते थे और समाज कल्याण विभाग के अधिकारी के लिए भी सप्ताह में एक दिन आना अनिनार्य हैं ।” यह हिस्सा संतोष सिंह के पोस्ट का है। संतोष ने लिखा है कि बालिका गृह की देखरेख के लिए पूरी व्यवस्था बनी हुई है। समाज कल्याण विभाग के पांच अधिकारी होते हैं, वकील होते हैं, समाजिक कार्य से जुड़े लोग होते हैं। एक दर्जन से ज्यादा लोगों की निगरानी के बाद भी 29 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है।आप जानते हैं कि हाईकोर्ट के अधीन राज्य विधिक आयोग होता है जिसके मुखिया हाईकोर्ट के ही रिटायर जज होते हैं । बालिका गृहों की देखरेख की जिम्मेवारी इनकी भी होती है। मामला सामने आते ही उसी दिन राज्य विधिक आयोग कि टीम बालिका गृह पहुंची। उसकी रिपोर्ट के बारे में जानकारी नहीं है। संतोष सिंह ने लिखा है कि बालिका गृह को चलाने वाला ब्रजेश ठाकुर पत्रकार भी रहा है और पत्रकारों के नेटवर्क में उसकी पैठ है। संतोष समझना चाहते हैं कि क्या इस वजह से मीडिया में चुप्पी है। बिहार के अख़बारों और चैनलों ने इस ख़बर को प्रमुखता नहीं दी। ज़िला संस्करण में ख़बर छपती रही मगर राजधानी पटना तक नहीं पहुंची और दिल्ली को तो पता ही नहीं चला। ब्रजेश ठाकुर के कई रिश्तेदार किसी न किसी चैनल से जुड़े हैं। ब्रजेश ठाकुर गिरफ्तार भी हुआ मगर तीसरे दिन बीमारी के नाम पर अस्पताल पहुंच गया। अस्पताल से ही फोन करने लगा तो बात ज़ाहिर हो गई। पुलिस को वापस जेल भेजना पड़ा। ब्रजेश ठाकुर के परिवार वालों का कहना है कि रिपोर्ट में उनका नाम इसलिए आया कि उन्होंने पैसा नहीं दिया। न ही समाज कल्याण विभाग के एफ आई आर में उनका नाम है। किसी का भी नाम नहीं है। फिर उन्हें निशाना क्यों बनाया जा रहा है।इस बात की तो पुष्टि हो ही चुकी है कि 29 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है। यह रिपोर्ट तो झूठी नहीं है। ब्रजेश ठाकुर दोषी है या नहीं, यह एक अलग सवाल है मगर जांच नहीं होगी तो पता कैसे चलेगा। जांच कैसे हो रही है, इस पर नज़र नहीं रखी जाएगी तो जांच कैसी होगी, आप समझ सकते हैं। सबके हित में है कि जांच सही से हो। संतोष सिंह ने ब्रजेश ठाकुर के रिमांड न मिलने पर भी हैरानी जताई है। ” ऐसा पहला केस देखने को मिला है जिसमें पुलिस ब्रजेश ठाकुर से पुछताछ के लिए रिमांड का आवेदन देती है लेकिन कोर्ट ने रिमांड की अनुमति नहीं दी। पुलिस ने दोबारा रिमांड का आवेदन किया तो कोर्ट ने कहा कि जेल में ही पूछताछ कीजिए । बाद में पुलिस ने कहां कि जेल में ब्रजेश ठाकुर पुछताछ में सहयोग नहीं कर रहे हैं,, दो माह होने को है अभी तक पुलिस को रिमांड पर नहीं मिला है ।” संतोष की इस बात पर ग़ौर कीजिए। बिहार सरकार भी इस मामले में चुप रही। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस ने 23 अप्रैल को बिहार समाज कल्याण विभाग को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। फिर भी कोई एक्शन नहीं हुआ। कशिश न्यूज़ ने इसका खुलासा नहीं किया होता तो किसी को भनक तक नहीं लगती और क्या पता बच्चियों के साथ बलात्कार होते रहता। एक महीने बाद समाज कल्याण विभाग एफ आई आर दर्ज करता है। संतोष ने यह भी लिखा है कि मुज़फ्फरपुर की एस एस पी हरप्रीत कौर ने अगर सक्रियता न दिखाई होती तो इस मामले में थोड़ी बहुत कार्रवाई भी नहीं होती। आप इसे चाहे जैसे देखें, मगर सिस्टम में इतना घुन लग गया है कि पेशेवर तरीके से कुछ भी होने की कोई उम्मीद नहीं है। वर्षों मुकदमा चलेगा, किसी को कुछ नहीं होगा। आखिर बिहार का मीडिया और मुज़फ्फपुर का नागरिक समाज इस सवाल पर चुप क्यों है कि एक कैंपस में 29 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है। उसे यह जानने में दिलचस्पी या बेचैनी क्यों नहीं है कि किन किन लोगों के सामने इन्हें डरा धमका कर पेश किया गया। क्या ये बलात्कार के लिए बाहर ले जाई गईं या बलात्कारी बालिका गृह के भीतर आए?

सरकारें चुरा रही हैं नौकरियां, नौजवान खा रहे हैं झांसा

क्या केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने वो कह दिया जो सब जानते हैं। उनका बयान आया कि आरक्षण लेकर क्या करोगे, सरकार के पास नौकरी तो है नहीं। बाद में नितिन गडकरी की सफाई आ गई कि सरकार आरक्षण का आधार जाति की जगह आर्थिक नहीं करने जा रही है। मगर इसी बयान का दूसरा हिस्सा भी था कि सरकार के पास नौकरी है नहीं। क्या वाकई सरकार या सरकारों के पास नौकरी नहीं है या वो देना नहीं चाहती हैं? आइये ज़रा इस पर विचार करते हैं। इस बयान को 5 अगस्त के टाइम्स आफ इंडिया में छपी पहली ख़बर के साथ मिलाकर देखिए। अख़बार ने फरवरी से जुलाई के बीच संसद में अलग अलग विभागों के संदर्भ में दिए गए आंकड़ों को एक जगह जमा कर पेश किया है। इससे यह तस्वीर बनती है कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास 24 लाख नौकरियां हैं। जिन पर वे बैठी हुई हैं। भारत के नौजवानों का दिल आज धड़क ही गया होगा जब उनकी नज़र इस ख़बर पर पड़ी होगी। प्राइम टाइम की नौकरी सीरीज़ में हम यह बात पिछले कई महीने से दिखा रहे हैं। अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ही पचासों लेख लिख चुका हूं। 24 लाख नौकिरयां होते हुए भी नहीं दी गईं हैं, नहीं दी जा रही हैं या देने में देरी की जा रही हैं, यह सूचना भारत के नौजवानों के उस तबके में है जो इन नौकरियों की तैयारी करते हैं। जो हर दिन भर्तियां निकलने का इंतज़ार करते हैं। जिन्हें पता है कि किस राज्य के लोक सेवा आयोग की भर्ती नहीं निकली है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने जो संकलन किया है उसके अनुसार 10 लाख नौकरियां तो सिर्फ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में हैं। लाखों नौजवान बीटेट और बीएड करके घर बैठे हैं मगर कहीं बहाली नहीं है। जहां कहीं है भी वहां ठेके पर है। पूरा काम करते हैं, पूरी सैलरी नहीं मिलती है। हक की बात करो तो सबको निकम्मा बताया जाने लगता है। क्या वाकई राजनीति को व्हाट्स एप पर भेजे जाने वाले प्रोपेगैंडा पर भरोसा हो चला है कि छात्र इन्हीं में उलझा रहेगा, कभी अपनी नौकरी की न बात करेगा न पूछेगा? अख़बार ने लिखा है कि पुलिस में पांच लाख 40 हज़ार वेकेंसी है। अर्ध सैनिक बलों में 61,509, सेना में 62,084, पोस्टल विभाग में 54,263, स्वास्थ्य केंद्रों पर 1.5 लाख, आंगनवाड़ी वर्कर में 2.2 लाख वेकेंसी है। एम्स में 21, 470 वेकेंसी है। अदालतों में 5,853 वेकेंसी है। अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में 12, 020 वेकेंसी है। इन सबके अलावा रेलवे में 2.4 लाख नौकरियां हैं। चार साल से नौजवान तैयारी करते रह गए, रेलवे में बहाली नाम मात्र की आई। किसी किसी विभाग में तो आई ही नहीं। रेलवे में 2 लाख से अधिक वेकैंसी है। फिर भी डेढ़ लाख भी नहीं निकली है। इस बार ज़रूर फार्म भरे जाने के बाद रेलवे ने सहायक लोको पायलट की संख्या 26,500 से बढ़ाकर 60,000 करने का फैसला किया है। अच्छी बात है मगर सहायक स्टेशन मास्टर की बहाली जैसा न हो जाए। 2016 में 18000 पदों के लिए फार्म भराया मगर नतीजा आया तो 4000 सीट कम हो गई। ऐसी कितनी ही परीक्षाओं के उदाहरण मिल जाएंगे। रेलवे में भी और रेलवे के बाहर भी। रेलवे की परीक्षा के सेंटर दूर दूर दिए गए हैं। सरकार ने इस मामले में कोई राहत नहीं दी है जबकि बड़ी संख्या में ग़रीब छात्र नहीं पहुंच पाएंगे या जाने के लिए कर्ज़ ले रहे हैं। वे अभी भी लिख रहे हैं कि एक दो बार और प्राइम टाइम में दिखा दें, हम लोग वाकई तनाव में हैं। रेल समय से नहीं चलती है। कई दिन पहले निकलना पड़ेगा। इस बीच दूसरी परीक्षाएं छूट जाएंगी। क्या पास के सेंटर पर परीक्षा नहीं हो सकती है? लेकिन रेलवे ने इसकी जगह वेकेंसी बढ़ा दी। बहुत अच्छा किया मगर इससे छात्रों की इस समस्या का समाधान नहीं हुआ कि पैसे के कारण वे सेंटर तक नहीं जा पा रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया का यह डेटा पूरा नहीं है। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारी चयन आयोगों के आंकड़े नहीं हैं। इसमें यह भी नहीं है कि कितनी भर्तियां अटकी पड़ी हैं। कितनी भर्तियां तीन तीन साल से अटकी पड़ी हैं। फार्म भरा गया है, परीक्षा नहीं, परीक्षा हो गई है, रिज़ल्ट नहीं, रिज़ल्ट निकल गया है, ज्वाइनिंग नहीं। भारत के सरकार के स्टाफ सलेक्शन कमीशन की भर्तियां कम हो गई हैं। नौजवानों से फार्म भरने के 3000 तक पैसे लिए जा रहे हैं। पैसे लेकर परीक्षा रद्द होती है, वो लौटाए नहीं जाते हैं। नौजवानों को पीस कर रख दिया है इन आयोगों ने। आयोग छोड़िए, कोर्ट की भर्तियां समय से और बिना विवाद के नहीं हो पा रही हैं। बिहार सिविल कोर्ट क्लर्क परीक्षा 2016 का रिज़ल्ट अभी तक नहीं निकला है। हाल ही में नौजवानों ने रिज़ल्ट निकालने को लेकर पटना के गांधी मैदान में प्रदर्शन भी किया था। अगर 24 लाख में राज्यों के आयोगों से आंकड़े लेकर जोड़ दिए जाएं तो यह संख्या पचास लाख तक पहुंच सकती है। 28 जुलाई के दि हिन्दू में विकास पाठक की रिपोर्ट है कि पिछले तीन साल में कालेजों में टेम्पररी से लेकर प्रोफेसर की कुल संख्या में 2.34 लाख की गिरावट आ गई है। 2015-16 में 10.09 लाख शिक्षक थे, 2017-18 में यह संख्या घटकर 8.88 लाख पर आ गई है। रिपोर्टर ने इस का सोर्स ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन रिपोर्टर 2017-18 का बताया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह संख्या नहीं है। हमने कई महीने नौकरी सीरीज़ चलाई है। अभी भी चलती रहती है। अभी भी छात्र अपनी नौकरियों को लेकर लिखते रहते हैं। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग इंजीनियरिंग सेवाओं की परीक्षा आयोजित करती है। 2013 की परीक्षा का फार्म दिसंबर 2013 में निकला था। तीन साल बाद यानी अप्रैल 2016 में परीक्षा होती है। अब छात्र जब रिजल्ट के लिए आयोग से संपर्क करते हैं तो कोई जवाब नहीं मिलता है। 2017 से लेकर वे आज तक विरोध प्रदर्शन ही कर रहे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। राजस्थान, बिहार, बंगाल, पंजाब, मध्य प्रदेश से तो आए दिन छात्र लिखते रहते हैं। ज़ाहिर है इन सभी नौकरियों की संख्या को जोड़ लें और कुछ साल पहले की संख्या से मिलाकर देखें तो समझ आएगा कि कितनी नौकरियां कम कर दी गई हैं। कम करने के बाद भी जो सीटें हैं, उन्हें भरा नहीं जा रहा है। क्या ये नौजवान वोट नहीं देते हैं, क्या इन्होंने किसी को वोट नहीं दिया था? सरकारों को कितना वक्त लगेगा कि हर विभाग में ख़ाली पदों के बारे में बताने में? पर यह सवाल पूछ कौन रहा है?क्या नौजवानों को इस सवाल का जवाब चाहिए? यह सवाल पहले वे ख़ुद से पूछें। नोट- ऐसे लेख अंग्रेज़ी अखबारों में कहीं कोने में तो कभी इधर उधर से छप जाते हैं। हिन्दी अखबारों से ऐसे विश्लेषण गायब होते जा रहे हैं। ज़रा ध्यान से पढ़िए। आपकी ही जवानी का सवाल है। नौकरी का तो है ही। u