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Thursday, 1 February 2018
नौकरियां कहां हैं, नौजवान कहां हैं, उनकी कहानियां कहां हैं
ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि सरकार पांच साल से ख़ाली पड़े पद समाप्त करने जा रही हैं। यह साफ नहीं है कि लगातार पांच साल से ख़ाली पड़े पदों की संख्या कितनी है। अवव्ल तो इन पर भर्ती होनी चाहिए थी मगर जब नौजवान हिन्दू मुस्लिम डिबेट में हिस्सा ले ही रहे हैं तो फिर चिन्ता की क्या बात। यह आत्मविश्वास ही है कि जिस समय रोज़गार बहस का मुद्दा बना हुआ है
उस समय यह ख़बर आई है।
वित्त मंत्रालय ने 16 जनवरी को अलग अलग मंत्रालयों और विभागों को ऐसे निर्देश भेज दिए हैं। विभाग प्रमुखों से कहा गया है कि ऐसे पदों की पहचान करें और जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपे।
इस ख़बर में नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का दिल धड़का दिया है। अब ये नौजवान क्या करेंगे, कोई इनकी क्यों नहीं सुनता, इन नौजवानों ने आख़िर क्या ग़लती कर दी ? बहुत सी परीक्षाएं हो चुकी हैं मगर ज्वाइनिंग नहीं हो रही है। 30 जनवरी को यूपी में तीन तीन भर्तियां रद्द हो गईं। लड़के उदास मायूस हैं। रो रहे हैं। उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
जिस 16 जनवरी को वित्त मंत्रालय ने तमाम विभागों को निर्देश दिए कि पांच साल से ख़ाली पड़े पदों को समाप्त कर दिया जाए, उसी 16 जनवरी को एक और ख़बर छपी थी। यह ख़बर भी वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर थी कि 1 मार्च 2016 तक चार लाख से अधिक पद ख़ाली पड़े थे। ये सारे पद केंद्र सरकार के विभागों से संबंधित हैं।
16 जनवरी के इकोनोमिक टाइम्स में रिपोर्ट छपी है कि 1 मार्च 2016 तक ग्रुप ए के 15, 284 पद ख़ाली थे। ग्रुब बी के 49, 740 पद ख़ाली पड़े थे। ग्रुप सी के 3, 21, 418 पद ख़ाली थे। ग्रुप सी के इन पदों के लिए लाखों की संख्या में मेरे नौजवान दोस्त आस लगाए बैठत हैं। आज इतने बड़े देश में इन नौजवानों के लिए बात करने वाला एक नेता नहीं है। मुझे क्रांति का गाना याद आ रहा है। वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो।
पिछले साल नवंबर में खादी ग्रामोद्योग आयोग ने 300 से अधिक की भर्ती निकाली। फार्म के लिए 1200 रुपये लिए और फीस लेने के कुछ दिन के भीतर ही भर्ती की प्रक्रिया अस्थायी रूप से स्थगित कर दी। ढाई महीने हो गए, उसका कुछ अता पता नहीं है। सोचिए खादी ग्रामोद्योग फार्म भरने के 1200 रुपये ले रहा है। सोचिए कि ये लोगों को सवाल नहीं लगता है।
2016-17 में प्रधानमंत्री रोज़गार प्रोत्साह योजना लांच हुई थी। एक साल में ही इसका बजट आधा किए जाने के संकेत है। ऐसा बिजनेस स्टैंडर्ड के रिपोर्टर सोमेश झा ने लिखा है। इस योजना के तहत अगर कोई कंपनी अपने कर्मचारी को EPFO, EPS में पंजीकृत कराती है तो सरकार तीन साल तक कंपनी का 8.33 प्रतिशत हिस्सा ख़ुद भरेगी। इससे लाभान्वित कर्मचारी वही होंगे जिनकी सैलरी 15000 रुपये प्रति माह तक ही होगी। सरकार ने इस योजना के लिए 1000 करोड़ का प्रावधान किया था।
अखबार लिखता है कि दिसंबर 2017 तक EPFO को मात्र 2 अरब रुपये ही मिले थे। उसने श्रम मंत्रालय को पत्र लिखकर 500 करोड़ की मांग की है। इसका मतलब यह है कि कंपनियों ने पंजीकृत तो करा दिया है मगर कंपनियों को हिस्सा नहीं मिल रहा है। 2017-18 के लिए 700 करोड़ की ही ज़रूरत पड़ी है।
इसका एक और मतलब है कि EPFO के रिकार्ड पर कम ही कर्मचारी जुड़े हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि जुलाई 2017 तक 9000 कंपनियों के 3, 61,024 लाख कर्मचारियों ने EPFO का लाभ लिया। उसके बाद अगस्त से दिसंबर 2017 के बीच 28,661 कंपनियों के 18 लाख कर्मचारियों ने इस योजना का लाभ लिया।
इस तरह कुल संख्या करीब 22 लाख के करीब बैठती है। हर महीने 3 लाख 66 हज़ार नए कर्मचारी EPFO से जुड़ते हैं। आप कह सकते हैं कि ये रोज़गार का आंकड़ा दर्शाता है। मगर कई बार कंपनियां सरकार की योजना का लाभ लेने के लिए उन कर्मचारियों को इस योजना से जोड़ती हैं जो पहले से काम कर रहे हैं। इसलिए दावे से नहीं कह सकते हैं कि यह नया रोज़गार है।
नौकरियां कहां हैं, नौजवान कहां हैं, उनकी कहानियां कहां हैं
ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि सरकार पांच साल से ख़ाली पड़े पद समाप्त करने जा रही हैं। यह साफ नहीं है कि लगातार पांच साल से ख़ाली पड़े पदों की संख्या कितनी है। अवव्ल तो इन पर भर्ती होनी चाहिए थी मगर जब नौजवान हिन्दू मुस्लिम डिबेट में हिस्सा ले ही रहे हैं तो फिर चिन्ता की क्या बात। यह आत्मविश्वास ही है कि जिस समय रोज़गार बहस का मुद्दा बना हुआ है
उस समय यह ख़बर आई है।
वित्त मंत्रालय ने 16 जनवरी को अलग अलग मंत्रालयों और विभागों को ऐसे निर्देश भेज दिए हैं। विभाग प्रमुखों से कहा गया है कि ऐसे पदों की पहचान करें और जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपे।
इस ख़बर में नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का दिल धड़का दिया है। अब ये नौजवान क्या करेंगे, कोई इनकी क्यों नहीं सुनता, इन नौजवानों ने आख़िर क्या ग़लती कर दी ? बहुत सी परीक्षाएं हो चुकी हैं मगर ज्वाइनिंग नहीं हो रही है। 30 जनवरी को यूपी में तीन तीन भर्तियां रद्द हो गईं। लड़के उदास मायूस हैं। रो रहे हैं। उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
जिस 16 जनवरी को वित्त मंत्रालय ने तमाम विभागों को निर्देश दिए कि पांच साल से ख़ाली पड़े पदों को समाप्त कर दिया जाए, उसी 16 जनवरी को एक और ख़बर छपी थी। यह ख़बर भी वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर थी कि 1 मार्च 2016 तक चार लाख से अधिक पद ख़ाली पड़े थे। ये सारे पद केंद्र सरकार के विभागों से संबंधित हैं।
16 जनवरी के इकोनोमिक टाइम्स में रिपोर्ट छपी है कि 1 मार्च 2016 तक ग्रुप ए के 15, 284 पद ख़ाली थे। ग्रुब बी के 49, 740 पद ख़ाली पड़े थे। ग्रुप सी के 3, 21, 418 पद ख़ाली थे। ग्रुप सी के इन पदों के लिए लाखों की संख्या में मेरे नौजवान दोस्त आस लगाए बैठत हैं। आज इतने बड़े देश में इन नौजवानों के लिए बात करने वाला एक नेता नहीं है। मुझे क्रांति का गाना याद आ रहा है। वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो।
पिछले साल नवंबर में खादी ग्रामोद्योग आयोग ने 300 से अधिक की भर्ती निकाली। फार्म के लिए 1200 रुपये लिए और फीस लेने के कुछ दिन के भीतर ही भर्ती की प्रक्रिया अस्थायी रूप से स्थगित कर दी। ढाई महीने हो गए, उसका कुछ अता पता नहीं है। सोचिए खादी ग्रामोद्योग फार्म भरने के 1200 रुपये ले रहा है। सोचिए कि ये लोगों को सवाल नहीं लगता है।
2016-17 में प्रधानमंत्री रोज़गार प्रोत्साह योजना लांच हुई थी। एक साल में ही इसका बजट आधा किए जाने के संकेत है। ऐसा बिजनेस स्टैंडर्ड के रिपोर्टर सोमेश झा ने लिखा है। इस योजना के तहत अगर कोई कंपनी अपने कर्मचारी को EPFO, EPS में पंजीकृत कराती है तो सरकार तीन साल तक कंपनी का 8.33 प्रतिशत हिस्सा ख़ुद भरेगी। इससे लाभान्वित कर्मचारी वही होंगे जिनकी सैलरी 15000 रुपये प्रति माह तक ही होगी। सरकार ने इस योजना के लिए 1000 करोड़ का प्रावधान किया था।
अखबार लिखता है कि दिसंबर 2017 तक EPFO को मात्र 2 अरब रुपये ही मिले थे। उसने श्रम मंत्रालय को पत्र लिखकर 500 करोड़ की मांग की है। इसका मतलब यह है कि कंपनियों ने पंजीकृत तो करा दिया है मगर कंपनियों को हिस्सा नहीं मिल रहा है। 2017-18 के लिए 700 करोड़ की ही ज़रूरत पड़ी है।
इसका एक और मतलब है कि EPFO के रिकार्ड पर कम ही कर्मचारी जुड़े हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि जुलाई 2017 तक 9000 कंपनियों के 3, 61,024 लाख कर्मचारियों ने EPFO का लाभ लिया। उसके बाद अगस्त से दिसंबर 2017 के बीच 28,661 कंपनियों के 18 लाख कर्मचारियों ने इस योजना का लाभ लिया।
इस तरह कुल संख्या करीब 22 लाख के करीब बैठती है। हर महीने 3 लाख 66 हज़ार नए कर्मचारी EPFO से जुड़ते हैं। आप कह सकते हैं कि ये रोज़गार का आंकड़ा दर्शाता है। मगर कई बार कंपनियां सरकार की योजना का लाभ लेने के लिए उन कर्मचारियों को इस योजना से जोड़ती हैं जो पहले से काम कर रहे हैं। इसलिए दावे से नहीं कह सकते हैं कि यह नया रोज़गार है।
Saturday, 20 January 2018
कोरेगांव में महारों की बहादुरी का सम्मान प्रधानमंत्री मोदी को भी करना चाहिए
फ्रांस में ब्रिटिश सरकार के लिए शहीद भारतीय सैनिकों को सलामी दी जा सकती है तो भीमा कोरेगांव के महार सैनिकों को क्यों नहीं?
अप्रैल 2015, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के लिल ( LILLE) स्थित NEUVE-CHAPELLE युद्ध स्मारक गए थे। वहां जाकर उन्होंने ब्रिटिश सेना की तरफ से फ्रांस की ज़मीन पर मारे गए 10,000 भारतीय सैनिकों की शहादत को सलामी दी थी। ऐसा करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने कहा था कि “हमारे जवानों ने विश्व युद्ध में विदेश ज़मीन पर लड़ाई लड़ी। अपनी निष्ठा, बहादुरी और त्याग के लिए दुनिया की प्रशंसा हासिल की। मैं उन्हें सलाम करता हूं। “
प्रधानमंत्री मोदी भारतीय सैनिकों की जिस निष्ठा और बहादुरी को सलाम कर रहे थे वो ब्रिटिश हुकूमत के प्रति थी न कि हिन्दुस्तान के प्रति। किसी भी लिहाज़ से प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम साहसिक था और अच्छा था। उन्हें याद नहीं रहा होगा वरना सबसे पहले वही कोरेगांव जाकर महार सैनिकों की बहादुरी का सम्मान करते।
कोरेगांव में ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए महार जाति के सैनिकों की बहादुरी का जश्न मनाने पर आपत्ति करने वालों को यह किस्सा ध्यान में नहीं रहा होगा। मैंने कई जगहों पर पढ़ा है कि महार जाति के सैनिक अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए लड़े थे। उनकी वीरता का गौरव गान आज कैसे हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी जब ब्रिटिश सेना में शामिल भारतीय जवानों की वीरता का सम्मान कर सकते हैं तो फिर कोरेगांव की गाथा का भी सम्मान सबको करना चाहिए। मराठा को भी, चितपावनों को भी और प्रधानमंत्री को सबसे पहले। उस जलसे में जिग्नेश के साथ प्रधानमंत्री को भी मंच साझा करना चाहिए था।
इतिहास हमारी दुविधा का इम्तहान ले रहा है। इसका एकमात्र कारण यह है कि जब इतिहास पढ़ने का वक्त होता है, तब हम उसे हिकारत की निगाह से देखते हैं। एक फालतू विषय समझते हैं। जब राजनीति के लिए इतिहास का इस्तमाल होता है, तब हम ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे इतिहास में आचार्य की डिग्री ली हो।
बहुत साल पहले मैंने 1857 की क्रांति पर एक स्पेशल रिपोर्ट तैयार किया था। उस रिपोर्ट में मेरठ के डाक्टर और इतिहासकार और झांसी की मिसेज कैंटम के प्रयासों की चर्चा थी। इन लोगों ने 1857 की क्रांति में मारे गए ब्रिटिश अफसरों और उनकी पत्नियों के कब्रिस्तान को फिर से ठीक ठाक कर दिया था। इन कब्रों को 1857 से जुड़ी स्मृतियों के नक्शे पर ला दिया था। उन कब्रों पर अंग्रेज़ अफ़सर और उनकी पत्नियों के साथ हुई हिंसा की दास्तान लिखी है। आज भी ब्रिटेन से उन अफसरों के ख़ानदान के नाती पोता जत्थे में आते हैं और इन कब्रों का दर्शन करते हैं।
इतिहास का अपराध बोध किसी भी समाज को जकड़ लेता है। वह इतिहास को समझने लायक नहीं रह जाता है। नासमझमी में वह वर्तमान से इतिहास का बदला लेने लगता है। इतिहास विषय की ट्रेनिंग से मैं इस अपराध बोध से उबर सका कि मैंने कोई ग़लती नहीं की है। इतिहास को हमेशा नए नए नज़रिए से देखते रहना चाहिए। सच बात यह है कि जब मैंने यह रिपोर्ट की थी तब लगा कि मुझसे कोई अपराध हो गया है। मुझे खुशी है कि मैंने वो रिपोर्ट की। सिपाहियों पर भी अलग से की।
यह सही है कि 1857 में ब्रिटिश सेना ने कई हज़ार भारतीयों को तोप से उड़ा दिया था। पेड़ से लटका दिया था। दिल्ली में लाल किला और जामा मस्जिद के इलाके में रहने वाले हज़ारों हिन्दुस्तानियों को उड़ा दिया था। यह भी सही है कि जवाबी हमले में ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों और पत्नियों पर भी ज़ुल्म
ढाए गए।
मेरठ के सेंट जॉन सेमिट्री में मैंने देखा कि ईस्ट इंडिया कंपनी के बहादुर अफसर गिलेस्पी की कब्र पर लोग फूल अगरबत्ती चढ़ाते हैं और मन्नतें मांगते हैं। गिलेस्पी की बहादुरी के हिसाब से उसकी क़ब्र काफी भव्य और विशाल है। इन सभी पहलुओं का ज़िक्र करना वतन के साथ गद्दारी नहीं बल्कि इतिहास के साथ एक अच्छा इंसाफ है। इतिहास का मतलब होता है जो हुआ है उसे जानना।
गोदी मीडिया के गुंडा एंकरों और चाटुकार राजनीतिक पत्रकारों ने इस बात का मज़ाक उड़ाया है कि ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए कोई बहादुरी का गौरव गान कैसे कर सकता है। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा के समय दी गई सलामी याद नहीं रही। प्रथम विश्व युद्ध में 11 भारतीयों को विक्टोरिया क्रास मिला था जिनमें से छह फ्रांस और फ्लैंडर्स में लड़ते हुए शहीद हो गए थे। हाल ही में एक फिल्म आई थी डनकर्क। इस फिल्म में भारतीय सैनिकों का पक्ष न दिखाए जाने की बहुत आलोचना हुई थी। इस बात के बावजूद फिल्म बेहद शानदार थी।
इतिहास की किसी घटना को आप मौजूदा पहचान की राजनीति का हिस्सा बनाएंगे तो समस्याएं पैदा होंगी। आनंद तेलतुम्बडे इस बारे में विस्तार से लिखा है कि भीमा कोरेगांव की घटना बहादुरी की मिसाल है मगर इसे अन्य मिसालों का प्रतीक बनाना भी एक तरह से मिथक रचना है। पर यह मिथक नकाबिलके बर्दाश्त अब क्यों हो रहा है. तीन साल से तरह तरह के मिथक बनाए जा रहे हैं। महाराणा प्रताप और रानी पदमिनी के इतिहास के साथ राजस्थान में जो हुआ वह भीमा कोरेगांव की घटना के इतिहासबाज़ी से कैसे अलग है।
अगर एक जाति विशेष को एक फिल्म के बहाने तमाम तरह के मिथकों के ऐतिहासक बना देने का दावा सही है तो एक जाति विशेष को अपने इतिहास के शानदार किस्से से नए नए मिथकों के गढ़ने की छूट क्यों नहीं है? इस अंतहीन सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं है। इतिहास को गौरव गाथा की किताब में आप जिनता समेटेंगे, अपना वर्तमान उतना ही संकुचित करेंगे। इस गौरव का कुछ इलाज कीजिए।
अगर आप वाकई भीमा कोरेगांव की घटना के बारे में जानना चाहते हैं कि 4 जनवरी के इंडियन एक्सप्रेस में गिरिश कुबेर और सुहास पलशिकर का लेख पढ़ सकते हैं। वायर में आनंद तेलतुम्बडे का लेख सबसे अच्छा है। फिर उसके बाद इस बहस में कूदिए।
Saturday, 2 December 2017
ग्लोबल व्यापार का इतिहास है सोमनाथ का
1026 में सोमनाथ मंदिर पर महमूद ग़ज़नी हमला करता है। इस घटना को लेकर आज तक नई नई व्याख्याएं होती रहती हैं और उस पर धारणाओं की परतें चढ़ाई जाती रहती हैं। उस वक्त भी और उसके बाद की सदियों में सोमनाथ मंदिर को लेकर अलग अलग लिखित ग्रंथों में दर्ज किया जाता है। फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, जैन, राजपूत दरबारों की वीर-गाथाएं, ब्रिटिश शासक और इतिहासकार, स्वतंत्रता आंदोलन के दौर के राष्ट्रवादी नेता। ये सब सोमनाथ को लेकर स्मृतियां गढ़ रहे थे। इतिहासकार रोमिला थापर ने इन अलग अलग ग्रंथों, दस्तावेज़ों और इतिहास लेखन में सोमनाथ मंदिर की घटना को कैसे दर्ज किया गया है, उसका अध्ययन किया है। वो पहले ही साफ कर देती हैं कि घटना क्यों हुई, किस मकसद से हुई, इसकी पड़ताल नहीं कर रही हैं बल्कि उसके बाद वो कैसे स्मृतियों और इतिहासलेखन में दर्ज होती है, उसे समझने का प्रयास कर रही हैं।
सोमनाथ मंदिर को लेकर जो धारणाएं बनती हैं या बनाई जाती हैं, जो दावे किए जाते हैं, उन्हीं सबको हम नैरेटिव, वृतांत या उससे भी सरल बहस कहते हैं। रोमिला थापर कहती हैं कि मैं यह देखना चाहती हूं कि यह घटना किस तरह स्मृतियों में प्रवेश करती है, वहां उसका स्वरूप कब कब कैसे कैसे बदलता है और यही यात्रा इतिहासलेखन के ज़रिए यह घटना कैसे तय करती है। क्यों लोगों की स्मृतियों का सोमनाथ, इतिहासलेखन में दर्ज सोमनाथ से अलग है। इसे समझने की ज़रूरत है। आप देख ही रहे हैं, आपके समय में भी इतिहास को लेकर यही होता रहा है। हमने अतीत में ही स्मृतियों को इतिहास की तरह नहीं गढ़ा है बल्कि अब तो हम टीवी के सामने बैठकर इतिहास की नई नई स्मृतियों को गढ़ रहे हैं। रानी पद्मावती के बारे में कह रहा हूं। रोमिला थापर की यह किताब 2004 में आई थी। SOMNATH- The Many Voices of a History , पेंग्विन इंडिया से छपी यह किताब तब 375 रुपये की थी।
अगर मंदिर कई बार टूटा और बना तो तोड़ने वाले कौन थे और प्रभावित होने वाले कौन थे। दोनों के बीच क्या संबंध थे और क्या विध्वंस या पुनर्निमाण के बाद दोनों के संबंध बदलते हैं? क्या सिर्फ इसमें दो ही पक्ष थे जिसे हम आमतौपर मुस्लिम और हिन्दू समझते हैं या दो से ज़्यादा पक्ष थे? तुर्क-फारसी दस्तावेज़ों में जो उस वक्त की ग़ज़नवी राजनीति को दर्ज कर रहे थे इस घटना को उस समय और उसके बाद के समय में अलग अलग तरीके से महत्व दिया गया है। शुरू में सोमनाथ मंदिर में किसी मूर्ति थी इस पर ज़ोर नहीं है, कितना धन था, इस पर है। बाद में इस घटना को भारत में इस्लामिक शासन की बुनियाद डालने के रूप में दर्ज किया जाता है। वो दौर पश्चिम और मध्य एशिया में अशांति का था,बग़दाद में ख़लिफ़ा को चुनौती दी जा रही थी, इस्लामिक जगत में बहुत कुछ हो रहा था। तुर्क वहां से निकल अपना विस्तार कर रहे थे।
घटना के 400 साल बाद के संस्कृति दस्तावेज़ों में इस बात का ज़िक्र है कि सोमनाथ मंदिर सिर्फ मंदिर नहीं था, उस वक्त अपने इलाके का राजनीतिक प्रशासक था जो फारसी व्यापारियों को कारोबार करने का परमिट भी जारी करता था। फारसी व्यापारियों से संबंध बहुत मधुर थे। 1951 में वहां उत्खनन होता है जिससे कई बार धारणाओं पर विराम लगता है। टूटने के बाद जो निर्माण होता है उससे पता चलता है कि मंदिर कई बार नहीं बल्कि तीन बार टूटा या तोड़ा गया। जबकि धारणाओं में मंदिर का विध्वंस कई बार होता है। उत्खनन से यह भी पता चलता है कि ग्रंथों में जिस तरह से मंदिर को विशाल रूप में दर्ज किया गया है, वास्तविक रूप उससे काफी अलग है। जैन व्यापारियों और दरबारी लेखकों के दस्तावेज़ों में भी मंदिर को लेकर अलग-अलग बातें मिलती हैं। 19 वीं सदी के शुरू में महमूद ग़ज़नी को लेकर जो मौखिक किस्से हैं उनका संग्रह किया जाता है, उन किस्सों से अलग ही इतिहास पता चलता है। आपको यही समझना है हर किस्सा इतिहास नहीं होता मगर वो इतिहास का हिस्सा हो जाता है। इतिहास वहीं तक है जहां तक प्रमाण हैं। बाकी किस्सों का इतिहास है मगर एक वो वास्तविक इतिहास नहीं है। क्योंकि कई किस्सों में पीर, फ़क़ीर, साधु और गुरु महमूद की तारीफ़ भी करते हैं। रोमिला थापर इन अलग अलग किस्सों को आमने-समाने रखकर सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनर्निमाण के इतिहास को समझने का प्रयास कर रही हैं। क्या इस घटना को भारत के अलग अलग समुदायों ने अलग-अलग निगाहों से देखा, क्या हमला सिर्फ धार्मिक शत्रुता के कारण हुआ, क्या राजनीतिक कारणों से इस घटना को बढ़ा-चढ़ा कर दर्ज किया जाता रहा है?
इन सब सवालों की पड़ताल करते हुए रोमिला थापर बेहद सरल और तरल अंग्रेज़ी में आपके लिए यह किताब लिखती हैं। पिछले सौ सालों में सोमनाथ और महमूद ग़ज़नी को लेकर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं। रोमिला हैरानी ज़ाहिर करती हैं कि इतने सारे लेखन के बाद भी संस्कृत ग्रंथों में सोमनाथ की घटना कैसे दर्ज है, इस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
19 वीं सदी में ब्रिटिश हाउस ऑफ कामंस में सोमनाथ मंदिर को लेकर ख़ूब बहस होती है, यहीं से वो नैरिटव मज़बूत होकर निकलती है कि महमूद ग़ज़नी के हाथों हिन्दुओं ने काफी प्रताड़ना झेली है। इस बहस के दौरान हिन्दू और मुस्लिम पीड़ित और आक्रांता की तरह उभरते हैं। यह पक्ष इतिहास की बाक़ी वास्तविकताओं पर हावी हो जाता है। रोमिला थापर लिखती हैं कि ज़्यादातर लेखन में मुस्लिम दस्तावेज़ों को ही महत्व दिया जाता है। गुजरात में चालुक्य राज के इतिहासकार ए के मजुमदार कहते हैं कि हिन्दू दस्तावेज़ों में मंदिर के विध्वंस की घटना को महत्व ही नहीं दिया गया है। जो भी लिखा गया है वह मुस्लिम दस्तावेज़ों के आधार पर। बीसवीं सदी में आज़ादी के बाद और ख़ासकर बाबरी मस्जिद ध्वंस के आस-पास से सोमनाथ मंदिर को लेकर फिर से विध्वंस का नैरेटिव हावी हो जाता है। 1951 में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण होता है। इसके पीछे के एम मुंशी का बहुत बड़ा प्रयास था। उनकी सोमनाथ पर किताब भी है।
सोमनाथ भी त्रिवेणी के संगम पर है। इस जगह को प्रभास (prabhasa) भी कहते हैं। यहां पर चंद्रगुप्त मौर्य के ईरानी गवर्नर ने सिंचाई के लिए बांध का निर्माण किया था, जो भारत में सिंचाई के लिए बांध बनाने के शुरूआती उदाहरणों में से एक है। उस ईरानी गवर्नर के ईरान से भी अच्छे संबंध थे। अशोक के शिलालेख भी यहां गिरनार में मिलते हैं। सातवीं सदी में ह्वेन सांग काठियावाड़ की यात्रा के दौरान लिखता है कि यहां बौद्ध मठों की संख्या कम होने लगी है, शैव और वैष्णवों की संख्या बढ़ने लगी है। ह्वेन सांग प्रभास में किसी मंदिर का ज़िक्र नहीं करता है। 19 वीं सदी के शुरू में ऐतिहासिक स्थलों का सर्वे करते हुए w.postan ने लिखा था कि सोमनाथ का मंदिर बौद्ध ढांचे पर बना था। जिसकी कभी पड़ताल नहीं हुई, रोमिला थापर कहती हैं कि इसकी पड़ताल की जा सकती थी। आठवीं सदी में सौराष्ट्र के वलाभी में अरबों का हमला होता है,वहां के शासक उस उस आक्रमण का मुकाबला करते हैं और रोक देते हैं। बाद में अरब हमलावार व्यापारी के रूप में बसने लगते हैं और विजय की इच्छा का त्याग कर देते हैं। गुजरात के सुदूर दक्षिण में राष्ट्रयुक्त के ग्रांट यानी अनुदानों से पता चलता है कि बौद्ध, जैन मतावलंबियों के साथ साथ अरबों को भी ग्रांट मिलता है।
वी के जैन ने अपनी किताब Trade and Traders in Western India में लिखा है कि ये अरब स्थानीय संस्कृति में रच-बस गए और स्थानीय लोगों से वैवाहिक संबंध भी बनाया। इनका ओमान, बसरा, बग़दाद और यमन से व्यापारिक लिंक बना रहा।संस्कृत के दस्तावेज़ों में अरबों का ज़िक्र ‘ताजिक’ के रूप में है, जिन्हें स्थानीय प्रशासक के रूप में भी दर्ज किया गया है। ये लोग उस इलाके के शासक राष्ट्रयुक्तों के गवर्नर भी बनाए जाते हैं। एक ज़िक्र यह भी मिलता है कि राष्ट्रयुक्त राजा ने एक ताजिक गवर्नर को मुंबई के उत्तर स्थित आज के संजन का प्रभारी बना दिया था, इस गवर्नर ने एक गांव को मंदिर बनाने के लिए अनुदान भी दिया था।
सोमनाथ मंदिर जहां हैं वहां समुद्र के कारण कई तरह की गतिविधियां हो रही थीं। काफी चहल-पहल का इलाका था। सौराष्ट्र में कभी कोई बड़ा राजवंश नहीं रहा। छोटे और मध्यम स्तर के राजा ही रहे हैं। नौवीं सदी का सैंधव सामंत( समझने के लिए छोटा राजा भी कह सकते हैं) सोमेश्वर के एक ब्राह्मण को ज़मीन दान देता है। ग्रांट के रूप में यह दर्ज है। इसी में ज़िक्र है कि प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय सौराष्ट्र में तीर्थ के लिए आता है, सौमेश्वर भी जाता है। मगर इन सबमें किसी में सोमनाथ के मंदिर का ज़िक्र नहीं है। बहुत बाद के दस्तावेज़ों में हेमचंद्र ने लिखा है कि जूनागढ़ के राजा तीर्थयात्रियों को प्रभास जाने से रोक दिया है। उसने ब्राह्मणों की हत्या की है, पवित्र स्थानों को भंग कर दिया है और बीफ खा लिया है। रोमिला कहती हैं कि शत्रुओं के बारे में कई बार इस तरह की बातें बना दी जाती थीं।
रोमिला थापर अपनी किताब में जो भी कह रही हैं, उसी पन्ने के नीचे उसका प्रमाण भी देती हैं कि कहां से उन्हें यह बात पता चली है। हम यहां साफ कर दें कि रोमिला थापर की कोई सेना नहीं हैं। आप उनकी किताब में लिखी गई बातों को न मानना चाहें तो बिल्कुल डरने की ज़रूरत नहीं हैं। वह कुछ नहीं करेंगी। मैंने उन्हीं का लिखा हुआ हिन्दी में पेश कर रहा हूं। रोमिला लिखती हैं कि एक जगह यह लिखा हुआ है किन भगवान सोम ने चालुक्य राजा मुलाराजा से कहा कि वह जूनागढ़ के राजा ग्रहारिपु को परास्त करे और प्रभास को उसके चंगुल से मुक्त करे। मुलाराजा ने यही किया और सोमेश्वर जाकर पूजा की। 10 वीं से 13 वीं सदी तक गुजरात में चालुक्य ही बड़े शासक थे, जिन्हें आज का सोलंकी कहा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि मुलाराजा ने ही सोमनाथ मंदिर का निर्माण कराया। मुलाराजा 997 में मर गए थे। मंदिर से मुलाराजा के संबंध होने के बहुत ठोस प्रमाण नहीं मिलते हैं, हो सकता है उन्होंने किसी छोटे मंदिर का पुनर्निमाण कराया हो। अगर मुलाराजा ने प्रभास में सोम का मंदिर बनाया भी होगा तो वह छोटा ही होगा क्योंकि अन्य जगहों पर उनके बनाए मंदिर छोटे ही हैं।
दसवीं सदी से सोमनाथ मंदिर के होने के स्पष्ट प्रमाण मिलने लगते हैं। अल बरूनी अपने संस्मरणों में ज़िक्र करता है, शाही तीर्थ यात्राओं में ज़िक्र आने लगता है। मंदिर के उत्खनन से भी यही समय साबित होता है। दसवीं सदी से पहले सोमनाथ के शिव मंदिर का ज़िक्र नहीं मिलता है। उस वक्त के सामंतों, ज़मींदारों जैसे वघेला, चुदास्मा, अभिहार, चावड़ा आदि की भूमिका मंदिर के प्रति बहुत सकारात्मक नहीं दिखती है। वे मंदिर प्रशासन और तीर्थयात्रियों को तंग करते हैं। काठियावाड़ के शासक की चालुक्य राजाओं से काफी शत्रुता रहती थी। रोमिला थापर गुजरात स्टेट गजेट के हवाले से लिखती हैं कि रनकादेवी की शादी चालुक्य राजा से होनी थी मगर किसी मामूली राजा से शादी हो जाती है। चालुक्य राजा जयसिम्हा नवघाना पर हमला कर देता है और रनकादेवी को अपने कब्जे में ले लेता है। रास्ते में रनकादेवी सती हो जाती हैं। H.C.RAY DYNASTIC HISTORIES OF NORTH INDIA में लिखते हैं कि अभिरा राजाओं को लूटपाट के कारण मलेच्छ कहा जाता था।
1000 से 1300 के बीच व्यापार के कारण गुजरात में काफी समृद्धि आती है। समृद्धि का यह दौर गुजरात को ग्लोबल बना देता है। यह वही समय है जब महमूद ग़ज़नी का हमला हो चुका था। अल बरूनी कहता है कि उस हमले के बाद वहां की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई मगर रोमिला थापर कहती हैं कि ऐसा नहीं हुआ। चालुक्य राजाओं के अलावा गुजरात में व्यापारियों ने भी सिंचाई के खूब संसाधन बनवाए। इस कारण सूखाग्रस्त सौराष्ट्र इलाके में खेती में भी काफी तरक्की हुई। चालुक्य राजा सोमनाथ पाटन पर छोटे-छोटे राजाओं के आक्रमण से परेशान रहते थे। वे तीर्थयात्रियों से टैक्स भी लेते थे और उन्हें लूटते भी थे। समुद्री यात्रा के दौरान लूट-मार की घटना आम थी। इसके बाद भी हर तरह से सोमनाथ आंतरिक और सामुद्रिक व्यापार का एक बड़ा केंद्र था। 9वीं से 15 वीं सदी का समय इस इलाके की अपार समृद्धि का समय था। वहां पर अलग अलग धर्मों और जगहों से लोग आकर बस रहे थे, कारोबार कर रहे थे और हर तरह का रिश्ता बना रहे थे।
रोमिला थापर यह भी लिखती हैं कि 12वीं सदी में महमूद गौरी हमला करता है तो एक हिन्दू व्यापारी वासा अभिहार की संपत्ति ज़ब्त नहीं कर पाता क्योंकि उसका ग़ज़नी मे भी काफी बड़ा कारोबार था। ग़ज़नी एक इलाक़े का नाम है। 14 वीं सदी में एक जैन व्यापारी जगादु ने अपने व्यापारी हिस्सेदार के लिए मस्जिद का निर्माण कराया था। ये सब अपवाद नहीं थे। व्यापारिक कारण रहे होंगे मगर एक दूसरे की संस्कृतियों और आस्थाओं को जगह देने की भावना काफी मज़बूत थी। मार्को पोलो ने भी लिखा है कि सोमनाथ के लोग व्यापार पर आश्रित हैं। होर्मुज़ से क़ीमती घोड़े का कारोबार ख़ूब होता था। भारत के घोड़े अच्छी नस्ल के नहीं होते थे। पश्चिम और मध्य एशिया से कारोबार बढ़ने के कारण उस वक्त के भारत को काफी फायदा हुआ था। इसके कारण होर्मुज और ग़ज़नी जैसे शहरों में भारतीय व्यापारियों के एजेंट भी जाकर बसे। उनका इतिहास खोजा जाए तो कितना दिलचस्प किस्सा निकलेगा। इस दौर में जैन व्यापारी काफी प्रभावशाली हुए और खूब सारे जैन मंदिरों का निर्माण करवाया।
15 वीं सदी से सोमनाथ से व्यापार का केंद्र बदलने लगा। उत्तर पश्चिम दर्रों से व्यापार होने लगा, अरब के व्यापारी सीधे उन रास्तों से आकर कारोबार करने लगे। उन्हें अब बिचौलियों की ज़रूरत नहीं थी। व्यापार के घटने का असर मंदिरों पर दिखने लगा जिन्हें काफी फायदा पहुंचा था। कहा जाता है कि इन्हीं हमलो के कारण व्यापार घट गया। हमले ज़रूर हुए मगर हमलों के कारण व्यापार नहीं घटा। अमीर मंदिरों पर हमले कभी कभार ही हुए। फारसी दस्तावेज़ों में बार बार बताया जाता है कि सोमनाथ को मस्जिद में बदल दिया गया है लेकिन रोमिला थापर कहती हैं कि इन हमलों के बाद भी कभी वहां होने वाली पूजा में रूकावट नहीं आई। वे नहीं मानती कि सोमनाथ को मस्जिद में बदला गया था। उस वक्त गुजरात में बसने वाले ज़्यादतर इस्माइली मुस्लिम थे, जिनकी अपनी मस्जिदें होती थीं। सुन्नी मुस्लिमों का इस्माइलियों ने काफी विरोध किया था। खोजा मुस्लिम इस्माइलियों के करीब थे, बोहरा मुस्लिम वैष्णवी परंपरा के करीब लगते थे। वे अवतार की परंपरा को मानते हैं और हिन्दू वसीयतों का पालन करते थे। दोनों का सल्तनत राजनीति में काफी वर्चस्व बढ़ गया था।
आपने देखा कि शुरू में तुर्क हमलावर बनकर आए, बाद में कारोबारी हो गए। जल्दी ही उनका इरादा बदल गया और वे उस इलाके की व्यापारिक समृद्धि का हिस्सेदार बने। खोजा, बोहरा और इस्माइली, तुर्क मुसलमानों से काफी अलग थे। एकतरफा व्यापारिक रिश्ता नहीं था। जैन व्यापारियों ने भी उसी तरह खाड़ी के देशों में अपना दबदबा बढ़ाया। रोमिला थापर लिखती हैं कि खाड़ी के देशों में जाने वाले भारतीयों ने कुछ लिखा हुआ नहीं छोड़ा कि उन्होंने वहां क्या देखा, अगर होता तो कितनी दिलचस्प बातें पता चलती कि उनके यहां से लोग भारत आकर क्या देख रहे हैं और भारत के लोग अरब जाकर क्या देख रहे हैं। काश, लिखा होता। कितनी भ्रांतियां दूर हो जातीं।
अब लेख काफी लंबा हो गया है। इसलिए रोक रहा हूं। अगली बार आगे का हाल लिखूंगा। अभी तक मैंने 36 पन्ने ही पढ़े हैं। 200 पेज का पढ़ना बाकी है। इतिहास का तलवार के दम पर नहीं पढ़ा जाता है। उसके लिए पन्ने पलटे जाते हैं।
Saturday, 25 November 2017
गुजरात चुनाव में बीजेपी का टिकट- कटेगा, मिलेगा और फिर कटेगा
बाजेपी को 2007 में 117 विधायक मिले थे। इनमें से 40 से अधिक विधायकों का टिकट 2012 में काट दिया गया था। इस बार कितनों का कटेगा?
हर पार्टी अपनी जीत के लिए रणनीति बनाती है। गुजरात में बीजेपी की जीत की रणनीति एक अहम हिस्सा है विधायकों का टिकट काटना। इस बार भी खूब कटेंगे। इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे दल विधायकों के टिकट नहीं काटते हैं। बीजेपी इतना टिकट क्यों काटती है? क्या उसके विधायक जीत कर काम नहीं करते हैं, जनता का सामना नहीं कर सकते, या विधायकों को पता है कि दोबारा टिकट तो मिलना नहीं तो काम क्यों करें?
हमने विधानसभा वार नामों की सूची बनानी शुरू की। 55-56 सीटों तक जाकर रूक गया। http://www.elections.in/gujarat पर जाकर देखने लगा। बेशक मुझसे ग़लती हो सकती है इसीलिए आगे तक नहीं देखा। लेकिन जो नतीजे आए वो दिलचस्प हैं। आप उन्हें देखते हुए गेस कर सकते हैं कि किस सीट पर किसका टिकट कटने वाला है और टिकटों की सूची आने पर मिला भी सकते हैं कि गेस सही हुआ या नहीं। अच्छा होता कि सभी सीटों का 2002, 2007 और 2012 के जीते उम्मीदवारों को देख पाता। पर कोई बात नहीं।
साबरमती विधानसभा में बीजेपी ने 2002 से कभी किसी उम्मीदवार को दोबारा टिकट नहीं दिया है। इस बार कहीं 2012 के जीते उम्मीदवार का टिकट न कट जाए! धनेरा विधानसभा में भी तीनों चुनाव में अलग अलग उम्मीदवार उतारे हैं। इस सीट पर 2012 में टिकट बदला तो बीजेपी का उम्मीदवार हार गया। इस बार भी यहां किसी नए को ही मिल सकता है।
भुज में भाजपा ने 2007 के विधायक को 2012 में नहीं दिया। क्या 2012 के विधायक को टिकट मिलेगा?
वाव विधानसभा क्षेत्र में भी भाजपा ने 2012 में 2007 के विधायक का टिकट काट दिया। 2012 वाले को 2017 में टिकट मिलेगा?
वडगाम- 2002 में बीजेपी ने श्रीमाली बाबुलाल चेलाभाई को टिकट दिया। कांग्रेस से हार गए। 2007 में बीजेपी ने फकीरभाई राघाभाई वाघेला को टिकट दिया वो जीत गए। राधा भाई 2012 में कांग्रेस से हार गए। मुमकिन यहां का बीजेपी उम्मीदवार नया होगा।
पालनपुर विधानसभा- 2002 में बीजेपी के कचोराया कांतिलाल धर्मदास जीते थे। 2007 में बीजेपी ने इन्हें टिकट नहीं दिया। गोविंदभाई माधवलाल प्रजापति को टिकट दिया उन्हें 66,835 वोट मिला और जीत गए, उन्हें 2012 में टिकट मिल गया मगर वे कांग्रेस से हार गए। यहां बीजेपी अबकी बार नए उम्मीदवार को टिकट दे सकती है।
दीसा से 2012 में बीजेपी ने 2007 में जीते हुए विधायक का टिकट काट दिया। नया उम्मीदवार कांग्रेस से हार गया। 2014 में जब उपचुनाव हुआ तो बीजेपी के लेबाभाई हार गएं। इसबार यहां से बीजेपी का नया उम्मीदवार हो सकता है।
देवदर विधानसभा- 2007 में बीजेपी के विजयी विधायक का टिकट 2012 में कट गया। 2012 में केशाजी शिवाजी चौहान जीत गए। वोट में 27000 की वृद्धि हुई। यहां टिकट कट सकता है?
राधनपुर विधानसभा- 1998 से बीजेपी जीत रही है मगर यहां 2007, 2012 में अलग अलग उम्मीदवारों को टिकट दिया। इसलिए इस बार 2012 के उम्मीदवार का टिकट कट सकता है।
चनाश्मा विधान सभा- यहां 2012 में भाजपा ने 2007 के जीते हुए विधायक को टिकट नहीं दिया। 2002 के उम्मीदवार को बीजेपी ने 2007 में यहां टिकट नहीं दिया था। यहां के विधायक का टिकट बदल सकता है।
पाटन- 2002, 2007, 2012 में बीजेपी ने अलग अलग उम्मीदवार उतारे और सभी जीते। 2002 में आनंदीबेन पटेल इसी सीट से जीती थीं।
खेरालु विधानसभा- बीजेपी ने यहां 2002 के उम्मीदवार का 2007 में टिकट काट दिया मगर 2012 में 2007 वाले को टिकट दिया। बीजेपी जीत गई। इस बार इनके टिकट कटने की उम्मीद की जा सकती है।
ऊंझा में नारायणभाई लल्लुदास पटेल को 2012 में दिया, 2007 में दिया। दोनों बार जीते। इस बार लल्लुदास जी को टिकट मिलेगा?
विसनगर विधानसभा में 2007 और 2012 में टिकट नहीं बदला है। वही उम्मीदवार जीत रहा है। इनका टिकट बदलेगा?
मेहसाणा से 2012 में नितिन पटेल जीते। मगर यहां से उन्हें 2007 के जीते हुए उम्मीदवार का टिकट काट कर उतारा गया था। क्या नितिन पटेल इस बार भी मेहसाणा से लड़ेंगे?
इदर विधानसभा से 1998 से बीजेपी के रमनभाई वोरा ही जीत रहे हैं। कभी टिकट नहीं बदला। ज़रूर यह उम्मीदवार ज़बरदस्त रहा होगा, क्या इस बार भी इन्हें टिकट मिलेगा या कट जाएगा?
जमालपुर से अशोक भट्ट 2002 से जीत रहे हैं। कहीं इनका नंबर तो नहीं कटेगा?
दासक्रोई का उम्मीदवार भी 2002 से लगातार जीत रहा है। क्या यहां का उम्मीदवार बना रहेगा या किसी नए को मिलेगा?
कलोल गांधीनगर से 2007 और 2012 में एक ही उम्मीदवार जीत रहा है. क्या यहां से उम्मीदवार बदलेगा?
एलिस ब्रीज विधानसभा से बीजेपी के रमेश शाह 2007 और 2012 में जीते हैं। इस बार मिलेगा?
असारवा में 2007 के जीते उम्मीदवार को 2012 में टिकट नहीं मिला। जबकि प्रदीपसिंह भगवतसिंह ज़डेजा 2002 और 2007 में जीत चुके थे। इस बार 2012 के विधायक को टिकट मिलेगा या कटेगा?
दासदा विधानसभा में 2007 में जीते हुए उम्मीदवार को 2012 में टिकट नहीं दिया। बीजेपी जीत गई। क्या इस बार इनका नंबर कटेगा?
बधवान विधासभा से 2007 और 2012 में भाजपा उम्मीदवार जीत रही हैं। क्या 2017 में टिकट मिलेगा?
चोटिला में 2007 के उम्मीदवार को 2012 में टिकट नहीं दिया। 2017 में?
मोरबी में 2007 से कांतिलाल शिवलाल अमृतिया ही जीत रहे हैं। क्या चौथी बार टिकट मिलेगा। इस बार कट जाने के चांस हैं।
विधानसभा क्षेत्र के नामों में त्रुटी हो सकती है। इसे कहीं और छापने से पहले एक बार अपना होमवर्क भी कर लें। इस आधार पर देखा जा सकता था कि बीजेपी कहां कहां उम्मीदवार बदलने वाली है। जब पार्टी इतना काम करती है, सरकार इतना काम करती है तो 30 से 35 उम्मीदवारों का टिकट काटने का क्या मतलब है? क्या पार्टी और सरकार काम करती है मगर विधायक काम नहीं करते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है। फिर से एक बार टिकट सब काटते हैं मगर गुजरात में बीजेपी जिस तादाद में टिकट काटती है उस तादाद में कोई नहीं काटता है। आप इस रणनीति के ज़रिए उम्मीदवार तो बदल देते हैं, नए को भी मौका देते हैं मगर जनता किससे हिसाब मांगे।
Monday, 13 November 2017
अपनी तरह की यह आख़िरी फ़िल्म है। जब तक ऐसी कोई दूसरी फ़िल्म नहीं बनती है, इसे अंतिम फ़िल्म कहने का जोखिम उठाया जा सकता है। शायद ही कोई राजनीतिक दल अपने भीतर किसी फ़िल्मकार को इतनी जगह देगा जहां से खड़ा होकर वह अपने कैमरों में उसके अंतर्विरोधों को दर्ज करता चलेगा। यह फ़िल्म राजनीति के होने की प्रक्रिया की जो झलक पेश करती है, वह दुर्लभ है। बहुत पीछे के इतिहास में जाकर नहीं बल्कि तीन चार वर्षों के इतिहास में जाकर जब AN INSIGNIFICANT MAN के पर्दे पर दृश्य चलते हैं तो देखने वाले के भीतर किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं। यह फ़िल्म एक दर्शक के तौर पर भी और एक राजनीतिक जीव होने के तौर पर भी देखने वाले को समृद्ध करेगी। हम प्रिंट में ऐसे लेख पढ़ते रहे हैं मगर सिनेमा के पर्दे पर इस तरह का सजीव चित्रण कभी नहीं देखा। मुमकिन है सिनेमा की परंपरा में ऐसी फिल्में बनी हों, जिनके बारे में मुझे इल्म नहीं है।
ख़ुश्बू रांका और विनय शुक्ल जब यह फ़िल्म बना रहे थे तब उनसे मिलने का मौका मिला था। तीस साल से भी कम के ये नौजवान जोड़े रात रात भर जाकर आम आदमी पार्टी के बनने की प्रक्रिया को अपने कैमरे में दर्ज कर रहे थे। दर्ज तो कई चैनलों ने भी किए मगर सबने अपने फुटेज का स्वाहा कर दिया, कभी लौट कर फिर से उन तस्वीरों को जोड़ कर देखने की कोशिश नहीं की। इसका कारण भी है। सबसे पहले मीडिया के पास यह सब करने की समझ और योग्यता नहीं है, बाद में लोगों की कमी और संसाधन की कमी का मसला भी शामिल हो जाता है।
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आम आदमी पार्टी नई बन रही थी, राजनीति की पुरानी परिपाटी को चुनौती दे रही थी और देने का दावा कर रही थी, शायद इसी जोश में पार्टी ने भीतर आकर ख़ुश्बू और विनय को शूट करने का मौका दे दिया होगा। जितना भी और जहां जहां मौका मिला, उससे आप राजनीतिक प्रक्रिया को काफी करीब से देख सकते हैं। दूसरे दल तो इतनी हिम्मत कभी नहीं करेंगे। इस फ़िल्म को देखते हुए आम आदमी पार्टी के नेता और समर्थकों को असहजता हो सकती है,मगर ऐसी भी असहजता नहीं होगी कि वे फ़िल्म से ही करताने लगें। यह फ़िल्म उनके इरादों को मज़बूत भी करेगी लेकिन पहले धीरे-धीरे कांटे भी चुभाती है। हंसाती भी है और रूलाती भी है। इस फिल्म के कई प्रसंग ख़ूब हंसाते हैं। आप ख़ुद पर, मीडिया पर और नेताओं पर भी हंस सकते हैं।
अरविंद केजरीवाल इस फ़िल्म के मुख्य किरदार हैं। एक मामूली इंसान। यह फ़िल्म उन्हें नायक या महानायक की निगाह से नहीं देखती है। एक कैमरा है जो चुपचाप उन्हें देखता रहता है। घूरता रहता है। वह देख रहा है कि कैसे एक मामूली आदमी राजनीति में कदम रख रहा है,हल्का लड़खड़ाता है, फिर संभलता है और दिग्गजों के अहंकार को मात देता है। कैसे उसके सिद्धांत और व्यवहार आपस में टकराते हैं। अरविंद केजरीवाल के आस-पास किस तरह अंतर्विरोध पनप रहे हैं, वे कैसे निकलते हैं और उसके शिकार होते हैं। ख़ुश्बू और विनय ने उसे बहुत ख़ूबसूरती से पकड़ा है। उनके सबके बीच अरविंद कैेसे टिके रहते हैं, नेता होने की अपनी दावेदारी कभी नहीं छोड़ते हैं। कैमरे का क्लोज़ अप कई बार उनके इरादों को पकड़ता है। हारते हुए देखता है और फिर जीतते हुए भी। पब्लिक के सामने जाने से पहले मंच के पीछे नेता का भाव क्या होता है,वह किन बातों को सुनता है और पब्लिक के बीच कैसे रखता है, यह सब आप देखते हुए रोमांचित हो सकते हैं। नेता होने का कौशल क्या होता है,आपको पता चलेगा।
यह सब आप दूसरे दलों में या अब आम आदमी पार्टी में भी होते हुए नहीं देख पाएंगे। दरअसल आप इस फिल्म को सिर्फ अन्ना आंदोलन के दौर की निगाह और स्मृतियों से नहीं देख पाएंगे। योगेंद्र और प्रशांत का अलग होना, कुमार विश्वास से दूरी का बनना यह सब तो नहीं है मगर उन्हें देखकर लगता है कि यह सब अलग होने वाले हैं या किए जाने वाले हैं। दरार सिर्फ भीतर से नहीं आ रही थी, बाहर से भी चोट करवाए जा रहे थे ताकि यह नया संगठन उभरने से पहले टूट जाए। आज तक यह प्रक्रिया जारी है और आगे भी जारी रहेगी।
इस फ़िल्म में मीडिया के भीतर मीडिया का संसार दिखता है। आम आदमी पार्टी अपना मीडिया रच रही थी तो मीडिया भी आम आदमी पार्टी रच रहा था। दोनों अपनी अपनी धार से एक दूसरे को काट भी रहे थे, तराश भी रहे थे। उसी दौरान मीडिया आम आदमी पार्टी को कुचलने का हथियार भी बनता है। वो पुराने दलों के साथ खड़ा दिखाई देने लगता है। यह सब इतनी तेज़ी से बदलते हैं कि आपकी स्मृतियां सहेज कर रखने में असफल हो जाती हैं। चुनावी सर्वे आते हैं और खारिज करते है, उनके आने और ध्वस्त हो जाने के बीच एंकर या रिपोर्टर किस तरह कैमरे के सामने निहत्था और नंगा खड़ा है, ख़ुश्बू और विनय को यह सब पकड़ने के लिए शुक्रिया अदा करना चाहिए। यह फिल्म बता रही है कि कैसे मीडिया भी अपने वक्त की राजनीति को पकड़ने में खोखला हो जाता है। खंडहर की तरह भरभरा कर गिर जाता है। एंकरों के वाक्य कैसे चतुराई से बदलते चले जाते हैं। इस प्रक्रिया में वे देखने वाले पर एक अहसासन करते हैं। ख़ुद जोकर लगते हैं और दर्शकों को ख़ूब हंसाते हैं। बाद में वही मीडिया आप के ख़िलाफ़ दूसरे दलों का हथियार बन जाता है। यह फ़िल्म सबको हंसाती है। दर्शक को,आप के कार्यकर्ता को, समर्थक को, मतदाता को, विरोधी को और मीडिया को भी।
यह फ़िल्म शुरू से लेकर अंत तक अरविंद केजरीवाल को महानायक या खलनायक के चश्मे से कहीं नहीं देखती है जैसा कि उस वक्त मीडिया और इस वक्त मीडिया करता है। बस एक कैमरा है जो चुपचाप देख रहा है कि क्या यह मामूली सत्ता के जमे जमाए खिलाड़ियों को मात दे सकता है, इस प्रक्रिया में वह ख़ुद भी मात खाता है मगर मात दे देता है। बिजली और पानी का बिल आधा करने का वादा पूरा कर देता है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को यह फ़िल्म देखनी चाहिए। टॉनिक का काम करेगी। एक राजनीतिक दल वैसे भी दिन रात अपनी आलोचनाओं से घिरा रहता है, उसी में जीता मरता है तो फिर इस फ़िल्म के साथ भी उसे जीना-मरना चाहिए। इस फ़िल्म से उभरने वाली नॉस्ताल्जिया उभरेगी आप के नेताओं को भी हंसाएंगी, रूलाएगी और चुप कराएगी। ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा।
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इस फिल्म में योगेंद्र यादव अपने आप दूसरे नायक के रूप में दिखते हैं। फिल्म की एडिटिंग उन्हें हमेशा अरविंद से दूर रखती है और दूसरे छोर पर रखती है। जीवंत फुटेज की एडिटिंग का कमाल देखिए। ऐसा लगता है कि फिल्म आगे होने वाले घटनाक्रम का दस्तावेज़ पेश कर रही हो। योगेंद्र के बाहर निकाले जाने या बाहर हो जाने का रास्ता ढूंढ रही हो। ख़ुश्बू और विनय ने फिल्म की एडिटिंग इस तरह की है कि दोनों साथ-साथ चलते हुए भी अलग लगें। राजनीति में जो नया होता है उसे नैतिकता ही सबसे पहले मारती है। छोटी छोटी नैतिकताएं उनका बड़ा इम्तहान ले लेती हैं। जबकि जमे जमाए दल ऐसी नैतिकताओं को धुएं में उड़ाकर चल देते हैं। कर लो जो करना है। हमीं हैं, हमीं रहेंगे।
AN INSIGNIFICANT MAN भारत के सिनेमाई इतिहास की एक जादुई फ़िल्म है। इसमें कोई भी कलाकार नहीं है बल्कि जो वास्तविक किरदार हैं, वही कलाकार की भूमिका में हैं। आम आदमी पार्टी इस बात का गर्व ले सकती है कि उसने अपने भीतर घट रही घटनाओं को दर्ज करने के लिए किसी फिल्मकार को जगह दी, अब हो सकता है कि वह ऐसा न कर सके जैसा कि दूसरी पार्टी भी नहीं करना चाहेंगे फिर भी एक प्रयोग के तौर पर ही सही, उनके लिए यह बहुमूल्य दस्तावेज़ तो है ही। अरविंद केजरीवाल जब आंदोलनकारी से नेता बन रहे थे तब हालात और व्यावहारिकताओं पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश में वो कैसे अंतर्रिविरोधों के शिकार हो रहे थे, इसका जीवंत दस्तावेज़ है और यह फ़िल्म उनके ख़िलाफ़ नहीं बल्कि उनके आगे की यात्रा के लिए एक अच्छी डिक्शनरी है। यही बात योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास, प्रशांत भूषण और शाज़िया इल्मी पर लागू होती है। फ़िल्म राजनीति का प्रमाणिक दस्तावेज़ है यह कहने से थोड़ा बचूंगा फिर भी कुछेक मामलों में यह प्रमाणिक दस्तावेज़ है।
ख़ुश्बू और विनय ने अपने महीनों के फुटेज से जो चुना है, उस पर आज का संदर्भ हावी है। उन हज़ारों घंटों के फुटेज से डेढ़ घंटे की फ़िल्म बनाई गई है। ज़ाहिर है नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा कट-छंट गया होगा। फिल्म के सारे फुटेज असली हैं मगर एडिटिंग में एक सिनेमाई कल्पना हावी है। कई दृश्य शानदार हैं। कैमरे का कमाल ऐसा है कि आप हतप्रभ रह जाएंगे। फ़िल्म के बारे में सब नहीं लिखना चाहता, मगर ऐसी फिल्म आपको दोबारा देखने को शायद ही मिले, इसलिए देख आइयेगा।
Monday, 6 November 2017
फिल्म पद्मावती को लेकर विरोध क्यों ? बीजेपी और राजपूत समुदाय ने की प्रतिबन्ध लगाने की मांग
प्रतिबन्ध लगाने की मांग
फिल्म पद्मावती अभी रिलीज़ भी नहीं हुई और फिल्म को लेकर हो रहा है बड़ा विरोध |पद्मावती 1 दिसंबर को रिलीज़ होने वाली है इसके ट्रेलर को 4 करोड़ से ज्यादा बार देखा गया है |लोगो को ट्रेलर काफी पसंद आ रहा है और समीक्षको द्वारा काफी सराहा जा रहा है | नया गाना घूमर भी लोगो को भा रहा है |शाहिद कपूर और रणवीर सिंह का किरदार भी लोगो को खूब पसंद आ रहा है | इसके उलट राजपूत समाज के कुछ लोग इसका विरोध कर रहे है |
गुजरात बीजेपी ने फिल्म रिलीज़ होने से पहले राजपूत समाज के प्रतिनिधियों को दिखाने की मांग की है | गुजरात चुनाव को देखते हुए बीजेपी ने फिल्म रिलीज़ टालने की मांग भी की है | आपको बता दू की गुजरात में 9 और 14 दिसंबर को वोटिंग होनी है | महाराष्ट्र के पर्यटन मंत्री जयकुमार तो फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने तक की बात कह रहे है | इसे आप नेताओ की मांग कहे या दोहरी राजनीति समझ से परे है |
करणी सेना ( राजपूत समुदाय के लोग ) का कहना है कि संजय लीला भंसाली फिल्म के जरिये इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर रहे है | जी हां मै उसी करणी सेना की बात कर रहा हु जिसने कुछ महीनो पहले राजस्थान में चल रही फिल्म की शूटिंग का विरोध किया था और संजय लीला भंसाली के साथ मारपीट की थी उसके बाद भंसाली ने मुंबई में ही फिल्म की अधूरी शूटिंग पूरी की | खैर अब फिल्म रिलीज़ होने वाली है तो मामला गर्माना बड़ी बात नहीं है |
ऐसा पहले भी होता रहा है फिल्मो को लेकर होने वाले विरोध फिल्म निर्माताओ का फायदा ही कर रहे है क्योकि जिन फिल्मो का पिछले कुछ सालो में विरोध हुआ है उन फिल्मो का बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड काफी अच्छा रहा है | फिल्म बाजीराव मस्तानी की रिलीज़ से पहले भी भंसाली पर इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप लगे थे |फिल्म के एक गाने का विरोध भी हुआ मगर इतने विरोध के बाद भी फिल्म की कमाई उम्मीद से ज्यादा रही और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई | बीजेपी के साथ कांग्रेस भी कह रही है कि फिल्म को करणी सेना की अनुमति के बाद ही रिलीज़ किया जाए |
बात यह है कि करणी सेना को रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच सपने वाले दृश्य से ऐतराज है | करणी सेना का कहना है कि पद्मावती कभी भी अलाउद्दीन खिलजी से नहीं मिली थी |मुंबई में फिल्म पद्मावती की रिलीज़ से पहले रांगोली बनाकर प्रचार किया जा रहा था जिसे राजपूत समुदाय के लोगो ने मिटा दिया |
क्या यह फिल्म सच में राजपूतो की भावनाओ को आहत कर सकती है ? या फिर इसे पब्लिसिटी पाने का मौका कहा जाए |यदि यह फिल्म सच में किसी समुदाय के लोगो को आहत कर रही है तो फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली को आगे आना चाहिए और इस विषय पर अपनी राय रखना चाहिए | फिल्म देखते वक्त लोगो को इतिहास की समझ नहीं होती इसलिए वो उस पर भरोसा कर लेते है जो दिखाया जा रहा है| उस फिल्म की कहानी के इतिहास के बारे में जानने की कोशिश भी नहीं करते चाहे कहानी काल्पनिक ही क्यों न हो |
हमारी फिल्म इंडस्ट्री पिछले कुछ सालो में काफी बदली है | फिल्मो में अब हम नई तकनीक का इस्तेमाल करने भी लगे है और बाहुबली जैसी हजार करोड़ की कमाई करने वाली फिल्म भी बनाने लगे है लोगो का फिल्म देखने का नज़रिया बदला है | आज के दर्शक फिल्म को बिना रिव्यु पढ़े देखने नहीं जाते | फिल्म निर्देशक दर्शको को गलत नहीं दिखा सकते और लाखो दर्शको का भरोसा नहीं तोड़ सकते |भंसाली साहब और राजपूत समुदाय को इस पर चर्चा करना चाहिए और समस्या का हल निकालना चाहिए | वैसे भी आखिर में जीत फिल्म की ही होती है कारण है हम हमारी फिल्म इंडस्ट्री और कलाकारों से बहुत प्यार करते है
#mjshajapur
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